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Javed Aslam
bazaahir paarsaaon ka labaada odhne waalon
bazaahir paarsaaon ka labaada odhne waalon | ब-ज़ाहिर पारसाओं का लबादा ओढ़ने वालों
- Javed Aslam
ब-ज़ाहिर
पारसाओं
का
लबादा
ओढ़ने
वालों
नहीं
तुम
तोड़
पाओ
गे
वतन
को
तोड़ने
वालों
- Javed Aslam
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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लहू
वतन
के
शहीदों
का
रंग
लाया
है
उछल
रहा
है
ज़माने
में
नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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मुसलसल
तजरबों
का
है
नतीजा
मैं
दरया
से
किनारा
हो
गया
हूँ
Madan Mohan Danish
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वतन
की
ख़ाक
ज़रा
एड़ियाँ
रगड़ने
दे
मुझे
यक़ीन
है
पानी
यहीं
से
निकलेगा
Unknown
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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शब
के
सन्नाटे
में
ये
किस
का
लहू
गाता
है
सरहद-ए-दर्द
से
ये
किस
की
सदा
आती
है
Ali Sardar Jafri
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लटकन
झटकन
ओढ़
मटकते
एक
परी
का
दिख
जाना,
प्लेन
गुजरने
पर
बचपन
के
ख़ुश
होने
सा
लगता
है!
बिन्दी,
लिपस्टिक,
चूड़ी,
कंगन
और
किनारा
साड़ी
का,
लाल
कलर
पर
कब्ज़ा
अय
हय
कितना
अच्छा
लगता
है!
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Atul K Rai
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नहीं
मैं
रह
नहीं
सकता
यहीं
मैं
कह
नहीं
सकता
किनारा
है
तभी
हूँ
मैं
नहीं
तो
बह
नहीं
सकता
पुरानी
एक
इमारत
हूँ
कि
क्या
देखा
नहीं
मैंने
किसी
के
छोड़
जाने
से
तो
मैं
यूँँ
ढह
नहीं
सकता
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Praveen Bhardwaj
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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दे
के
ख़ुशबू
कहीं
खो
जाते
हैं
अफ़सानों
में
गुल
जो
असली
हैं
कहाँ
टिकते
हैं
गुलदानों
में
Javed Aslam
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दे
के
ख़ुशबू
ये
बिखर
जाता
है
फूल
महबूब
पे
मर
जाता
है
दर्द
जब
हद
से
गुज़र
जाता
है
जान
जाते
ही
ठहर
जाता
है
वस्ल
हो
या
हो
जुदाई
का
ग़म
चढ़ता
दरया
है
उतर
जाता
है
ख़ू
कोई
आँधियों
का
हो
जाए
तो
किनारों
से
वो
डर
जाता
है
ज़िन्दगी
खेल
मवाक़े'
का
है
जो
नहीं
खेलता
घर
जाता
है
मुंसिफ़ी
वक़्त
से
सीखो
'असलम'
हो
ये
कैसा
भी
गुज़र
जाता
है
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Javed Aslam
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दूर
क़िस्तों
में
जा
रहे
हो
तुम
मेरे
दिल
का
ख़याल
करते
हो
Javed Aslam
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गुज़र
जाएँगे
ये
लम्हे
बहर-सूरत
बहर-क़ीमत
यही
है
ख़ुश-गुमानी
भी
यही
अफ़सुर्दगी
भी
है
Javed Aslam
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उम्र
हर
शख़्स
काट
लेता
है
ज़िंदगी
चंद
लोग
जीते
हैं
Javed Aslam
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