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Javed Aslam
ashk ko gauhar banaa lo
ashk ko gauhar banaa lo | अश्क को गौहर बना लो
- Javed Aslam
अश्क
को
गौहर
बना
लो
दर्द
को
ज़ेवर
बना
लो
राह
के
पत्थर
को
'असलम'
मील
के
पत्थर
बना
लो
- Javed Aslam
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अश्क
माँ
के
जो
ख़ुशी
से
गिरे
तो
हैं
मोती
और
छलके
जो
ग़मों
से
तो
लहू
हो
जाए
S M Afzal Imam
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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माँ
के
आँसू
को
समझता
हूँ
मुक़द्दस
इतना
बस
उन्हें
चूम
ले
अफ़ज़ल
तो
वज़ू
हो
जाए
S M Afzal Imam
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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मेरे
आँसू
मिरे
अंदर
ही
गिरे
रोने
से
जी
और
बोझल
हो
गया
Abbas Tabish
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अल्लाह
बना
दे
मिरे
अश्कों
को
कबूतर
सब
पूछ
रहे
हैं
तिरे
रूमाल
में
क्या
है
Khan Janbaz
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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इतना
तो
ज़िन्दगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
जिस
तरह
हँस
रहा
हूँ
मैं
पी
पी
के
गर्म
अश्क
यूँँ
दूसरा
हँसे
तो
कलेजा
निकल
पड़े
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Kaifi Azmi
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गर्म
आँसू
और
ठंडी
आहें
मन
में
क्या
क्या
मौसम
हैं
इस
बग़िया
के
भेद
न
खोलो
सैर
करो
ख़ामोश
रहो
Ibn E Insha
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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प्यास
दुनिया
की
बुझ
जाए
इस
वासते
धूप
में
एक
पर्बत
पिघलता
रहा
Javed Aslam
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आप
ने
फेर
ली
नज़र
अपनी
अब
मुझे
ही
नहीं
ख़बर
अपनी
आप
की
तो
कमी
रही
लेकिन
ज़िन्दगी
हो
गई
बसर
अपनी
मुड़
के
देखा
तो
ये
नज़र
आया
कितनी
मुश्किल
थी
ये
डगर
अपनी
शाम
क़िस्मत
में
मेरी
हो
कि
न
हो
शाद
कर
लूँ
मैं
दोपहर
अपनी
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Javed Aslam
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घर
मिरा
जगमगाया
करे
तू
यूँँ
ही
रोज़
आया
करे
चार
दिन
की
तो
हो
चाँदनी
फिर
अँधेरा
डराया
करे
मैं
बुलंदी
को
छूता
रहूँ
तोहमतें
वो
लगाया
करे
थाम
ले
हाथ
अपना
कोई
जब
क़दम
डगमगाया
करे
याद
अच्छी
मिरे
साथ
हो
तल्ख़ियाँ
धुँधलाया
करे
जब
भी
लौटूँ
मैं
घर
को
मिरे
माँ
खड़ी
मुस्कुराया
करे
देखा
सपने
में
जन्नत
में
थे
तुम
ही
थे
वो
ख़ुदाया
करे
तेरि
ख़ातिर
ऐ
'असलम'
यहाँ
क्यूँ
कोइ
वक़्त
ज़ाया'
करे
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Javed Aslam
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ज़िंदगी
ने
जो
दिखाया
है
वही
क्या
कम
था
आलम-ए-हश्र
का
मंज़र
भी
अभी
बाक़ी
है
Javed Aslam
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क़त्ल
कर
तो
दिया
इक
नज़र
से
मगर
फिर
न
जाने
वो
क़ातिल
कहाँ
रह
गया
Javed Aslam
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