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Javed Aslam
ghar mira jagmagaya kare
ghar mira jagmagaya kare | घर मिरा जगमगाया करे
- Javed Aslam
घर
मिरा
जगमगाया
करे
तू
यूँँ
ही
रोज़
आया
करे
चार
दिन
की
तो
हो
चाँदनी
फिर
अँधेरा
डराया
करे
मैं
बुलंदी
को
छूता
रहूँ
तोहमतें
वो
लगाया
करे
थाम
ले
हाथ
अपना
कोई
जब
क़दम
डगमगाया
करे
याद
अच्छी
मिरे
साथ
हो
तल्ख़ियाँ
धुँधलाया
करे
जब
भी
लौटूँ
मैं
घर
को
मिरे
माँ
खड़ी
मुस्कुराया
करे
देखा
सपने
में
जन्नत
में
थे
तुम
ही
थे
वो
ख़ुदाया
करे
तेरि
ख़ातिर
ऐ
'असलम'
यहाँ
क्यूँ
कोइ
वक़्त
ज़ाया'
करे
- Javed Aslam
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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बंदा
किसी
के
साथ,
ख़ुदा
हो
किसी
के
साथ
जाने
पराए
शहर
में
क्या
हो
किसी
के
साथ
Mueed Mirza
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दुश्मनी
कर
मगर
उसूल
के
साथ
मुझ
पर
इतनी
सी
मेहरबानी
हो
मेरे
में'यार
का
तक़ाज़ा
है
मेरा
दुश्मन
भी
ख़ानदानी
हो
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Akhtar Shumar
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मुझे
मालूम
है
माँ
की
दुआएँ
साथ
चलती
हैं
सफ़र
की
मुश्किलों
को
हाथ
मलते
मैंने
देखा
है
Aalok Shrivastav
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मैं
जंगलों
की
तरफ़
चल
पड़ा
हूँ
छोड़
के
घर
ये
क्या
कि
घर
की
उदासी
भी
साथ
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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सँभलता
हूँ
तो
ये
लगता
है
जैसे
तुम्हारे
साथ
धोखा
कर
रहा
हूँ
Shariq Kaifi
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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अच्छा
है
दिल
के
साथ
रहे
पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन
कभी
कभी
इसे
तन्हा
भी
छोड़
दे
Allama Iqbal
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जता
दिया
कि
मोहब्बत
में
ग़म
भी
होते
हैं
दिया
गुलाब
तो
काँटे
भी
थे
गुलाब
के
साथ
Rehman Faris
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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बिछी
आँखें
खुली
बाहें
तो
इक
अफ़साना
लगता
है
वही
है
शहर
लेकिन
अब
मुझे
बेगाना
लगता
है
Javed Aslam
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दर्स
देने
चले
वफ़ा
की
वो
जो
सनद-याफ़्ता
जफ़ा-गर
हैं
Javed Aslam
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जज़्बात-ओ-ख़यालात-ओ-मनाज़िर
पे
न
रुकना
झोंके
हैं
हवाओं
के
ये
चलते
ही
रहेंगे
हिजरत
के
भी
दरवाज़े
खुले
रखना
है
दिल
में
दुनिया
है
यहाँ
लोग
निकलते
ही
रहेंगे
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Javed Aslam
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बदगुमानी,
अना,
हसद
'असलम'
ख़ाक
रिश्तों
पे
डार
जाते
हैं
Javed Aslam
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चाँद
दर्पण
में
उतारा
कि
उसे
छू
पाऊँ
फ़ासलों
में
न
कमी
हो
सकी
रत्ती
भर
भी
Javed Aslam
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