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Javed Aslam
bichi aañkhen khulii baahen to ik afsaana lagta hai
bichi aañkhen khulii baahen to ik afsaana lagta hai | बिछी आँखें खुली बाहें तो इक अफ़साना लगता है
- Javed Aslam
बिछी
आँखें
खुली
बाहें
तो
इक
अफ़साना
लगता
है
वही
है
शहर
लेकिन
अब
मुझे
बेगाना
लगता
है
- Javed Aslam
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ऐसा
बदला
हूँ
तिरे
शहर
का
पानी
पी
कर
झूट
बोलूँ
तो
नदामत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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किसी
गली
में
किराए
पे
घर
लिया
उसने
फिर
उस
गली
में
घरों
के
किराए
बढ़ने
लगे
Umair Najmi
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और
क्या
चाहती
है
गर्दिश-ए-अय्याम
कि
हम
अपना
घर
भूल
गए
उन
की
गली
भूल
गए
Jaun Elia
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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ये
सोच
कर
के
वो
खिड़की
से
झाँक
ले
शायद
गली
में
खेलते
बच्चे
लड़ा
दिए
मैंने
Unknown
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ये
मयकशों
का
तवाज़ुन
भी
क्या
तवाज़ुन
है
खड़े
भी
रहना
सहूलत
से
लड़खड़ाना
भी
हमारे
शहर
के
लोगों
को
ख़ूब
आता
है
किसी
को
सर
पे
बिठाना
भी
और
गिराना
भी
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Imran Aami
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पानी
आँख
में
भरकर
लाया
जा
सकता
है
अब
भी
जलता
शहर
बचाया
जा
सकता
है
Abbas Tabish
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ये
सर्द
रात
ये
आवारगी
ये
नींद
का
बोझ
हम
अपने
शहर
में
होते
तो
घर
चले
जाते
Ummeed Fazli
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लकीरें
खींच
के
मिट्टी
पे
बैठ
जाता
हूँ
यहाँ
मकाँ
था,
ये
बाज़ार,
ये
गली
उस
की
Ashraf Yousafi
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दिल
की
गहराई
में
आकर
छुप
गए
आपको
देखे
हुए
अर्सा
हुआ
Javed Aslam
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वो
तो
दिखते
नहीं
खड़े
लेकिन
शाम
दर
पर
पुकार
जाते
हैं
Javed Aslam
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तोड़
कर
दिल
मिरा
अब
जा
तू
जिधर
जाएगा
वक़्त
अच्छा
न
सही,
फिर
भी
गुज़र
जाएगा
Javed Aslam
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दे
के
ख़ुशबू
ये
बिखर
जाता
है
फूल
महबूब
पे
मर
जाता
है
दर्द
जब
हद
से
गुज़र
जाता
है
जान
जाते
ही
ठहर
जाता
है
वस्ल
हो
या
हो
जुदाई
का
ग़म
चढ़ता
दरया
है
उतर
जाता
है
ख़ू
कोई
आँधियों
का
हो
जाए
तो
किनारों
से
वो
डर
जाता
है
ज़िन्दगी
खेल
मवाक़े'
का
है
जो
नहीं
खेलता
घर
जाता
है
मुंसिफ़ी
वक़्त
से
सीखो
'असलम'
हो
ये
कैसा
भी
गुज़र
जाता
है
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Javed Aslam
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एक
दूजे
से
जो
शिकायत
है
वो
'अदावत
नहीं
रिवायत
है
ज़िन्दगी
है
तो
मस'अले
भी
हैं
बिन
मसाइल
तो
ये
हिकायत
है
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Javed Aslam
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