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Javed Aslam
aap ne fer li nazar apni
aap ne fer li nazar apni | आप ने फेर ली नज़र अपनी
- Javed Aslam
आप
ने
फेर
ली
नज़र
अपनी
अब
मुझे
ही
नहीं
ख़बर
अपनी
आप
की
तो
कमी
रही
लेकिन
ज़िन्दगी
हो
गई
बसर
अपनी
मुड़
के
देखा
तो
ये
नज़र
आया
कितनी
मुश्किल
थी
ये
डगर
अपनी
शाम
क़िस्मत
में
मेरी
हो
कि
न
हो
शाद
कर
लूँ
मैं
दोपहर
अपनी
- Javed Aslam
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जो
तुम्हें
मंज़िल
पे
ले
जाएँगी
वो
राहें
अलग
हैं
मैं
वो
रस्ता
हूँ
कि
जिस
पर
तुम
भटक
कर
आ
गई
हो
Harman Dinesh
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भूल
जोते
हैं
मुसाफ़िर
रस्ता
लोग
कहते
हैं
कहानी
फिर
भी
Ambreen Haseeb Ambar
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औरों
का
बताया
हुआ
रस्ता
नहीं
चुनते
जो
इश्क़
चुना
करते
हैं,
दुनिया
नहीं
चुनते
Bhaskar Shukla
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मंज़िल
मिली
तो
उसकी
कमी
हमको
खा
गई
सामान
रास्ते
में
जो
खोना
पड़ा
हमें
Abbas Qamar
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हर
तरफ़
उग
आए
हैं
जंगल
हमारी
हार
के
जीत
का
कोई
भी
रस्ता
अब
नहीं
दिखता
हमें
Siddharth Saaz
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़
में
रोता
है
क्या
आगे
आगे
देखिए
होता
है
क्या
Meer Taqi Meer
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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ज़रा
सी
देर
को
सकते
में
आ
गए
थे
हम
कि
एक
दूजे
के
रस्ते
में
आ
गए
थे
हम
जो
अपना
हिस्सा
भी
औरों
में
बाँट
देता
है
एक
ऐसे
शख़्स
के
हिस्से
में
आ
गए
थे
हम
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Ismail Raaz
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कोई
काँटा
कोई
पत्थर
नहीं
है
तो
फिर
तू
सीधे
रस्ते
पर
नहीं
है
मैं
इस
दुनिया
के
अंदर
रह
रहा
हूँ
मगर
दुनिया
मेरे
अंदर
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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अगर
तुम
हो
तो
घबराने
की
कोई
बात
थोड़ी
है
ज़रा
सी
बूँदा-बाँदी
है
बहुत
बरसात
थोड़ी
है
ये
राह-ए-इश्क़
है
इस
में
क़दम
ऐसे
ही
उठते
हैं
मोहब्बत
सोचने
वालों
के
बस
की
बात
थोड़ी
है
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Abrar Kashif
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घर
हमारी
वजह
से
कई
बस
गए
मेरे
हिस्से
में
ख़ाली
मकाँ
रह
गया
Javed Aslam
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जुंबिश-ए-लब
से
कुछ
न
निकले
गा
मेरी
नज़रों
से
बात
कर
लीजे
Javed Aslam
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उस
गए
साल
की
ख़ता
क्या
थी
इस
नए
साल
में
नया
क्या
है
Javed Aslam
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तुम
मुझे
आज़मा
के
तो
देखो
मुझ
सेे
तुम
दूर
जा
के
तो
देखो
तुम
हो
रौशन
मिरी
निगाहों
में
दीप
मेरा
बुझा
के
तो
देखो
तुम
मुझे
बे-वफ़ा
कहो
लेकिन
ख़ाना-ए-दिल
में
आ
के
तो
देखो
मैं
ही
मैं
आऊँगा
नज़र
हर-सू
दिल
की
महफ़िल
सजा
के
तो
देखो
हाल-ए-दिल
तुम
छुपा
न
पाओगे
तुम
ज़रा
मुस्कुरा
के
तो
देखो
ख़ुद
ख़ुदा
ही
हो
नाख़ुदा
जिसका
उसकी
कश्ती
डुबा
के
तो
देखो
आँधियों
का
न
बस
चला
'असलम'
साहिलों
तुम
डरा
के
तो
देखो
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Javed Aslam
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क़ीमतों
का
हो
जो
मोहताज
चुकाना
छोड़ो
अब
तो
आसान
हुआ
तर्क-ए-त'अल्लुक़
करना
Javed Aslam
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