zindagi ko ik musalsal imtihaan kahte rahe | ज़िंदगी को इक मुसलसल इम्तिहाँ कहते रहे

  - JaiKrishn Chaudhry Habeeb
ज़िंदगीकोइकमुसलसलइम्तिहाँकहतेरहे
लग़्ज़िश-ए-पाकोहीमंज़िलकानिशाँकहतेरहे
मस्लहतथीयाकिथीवोइश्क़कीमजबूरियाँ
उसबुत-ए-नामेहरबाँकोमेहरबाँकहतेरहे
चुपकेचुपकेकहगईजोदास्ताँकोदास्ताँ
उसनिगाह-ए-शौक़कोहमबे-ज़बाँकहतेरहे
इकतबस्सुमइकनिगहऔरएकक़तराअश्कका
बसइन्हींपरकहनेवालेदास्ताँकहतेरहे
ज़र्दपत्तेख़ुश्ककलियाँफूलमुरझाएहुए
येहैंअक्स-ए-क़ल्ब-ए-वीराँहमख़िज़ाँकहतेरहे
अपनेहीज़ौक़-ए-नज़रनेबख़्शीउनकोदिलबरी
वर्नाक्याहैजिसकोहमहुस्न-ए-बुताँकहतेरहे
गोशा-ए-दिलमेंवोमेरेसबसिमटकररहगया
ग़मकाइकतूफ़ाँजिसेअहल-ए-जहाँकहतेरहे
जल्वा-गररगरगमेंहैऔरदीदा-ओ-दिलमेंनिहाँ
हमजिसेख़ल्वत-नशीन-ए-ला-मकाँकहतेरहे
प्यारकेलम्हेजोउनकीबज़्ममेंगुज़रे'हबीब'
हमहयात-ए-ख़िज़्रपरउनकोगराँकहतेरहे
  - JaiKrishn Chaudhry Habeeb
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy