saaz-e-ulfat hai mire saaz-e-jigar hone tak | साज़-ए-उल्फ़त है मिरे साज़-ए-जिगर होने तक

  - JaiKrishn Chaudhry Habeeb
साज़-ए-उल्फ़तहैमिरेसाज़-ए-जिगरहोनेतक
हुस्नदिलकशहैमिरेज़ौक़-ए-नज़रहोनेतक
अज़्म-ए-इंसाँनेसितारोंपेकमंदेंडालीं
मंज़िलेंदूरहैंसरगर्म-ए-सफ़रहोनेतक
बारहानन्हासादिलख़ूनहुआज़ेर-ए-फ़लक
ग़ुंचेपरगुज़रीहैक्याक्यागुल-ए-तरहोनेतक
रिफ़अतेंकौनसीहैछूसकेजिनकोख़याल
हद-ए-पर्वाज़हैतख़्ईलकेपरहोनेतक
ज़िंदगीतल्ख़हक़ीक़तहैकिएकख़्वाब-ए-हसीं
कौनसमझाहैइसेउम्रबसरहोनेतक
करगईतुझकोपरेशाँमिरीआशुफ़्ता-सरी
येयक़ींथातिरीआँखकेतरहोनेतक
हमसर-ए-शामजलातेहैंतसव्वुरकेचराग़
कौनदेखेगातिरीराहसहरहोनेतक
तेरेवा'देकभीशर्मिंदा-ए-ईफ़ाहुए
वर्नाजीतातिरेआनेकीख़बरहोनेतक
वा'दाबे-कैफ़हैबे-रंगहैगुलज़ार'हबीब'
दिलहैसूनासातिरीलुत्फ़-ए-नज़रहोनेतक
  - JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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