azal se baada-e-hasti ki arzaani nahin jaati | अज़ल से बादा-ए-हस्ती की अर्ज़ानी नहीं जाती

  - Jagdish Sahay Saxena
अज़लसेबादा-ए-हस्तीकीअर्ज़ानीनहींजाती
इसअर्ज़ानीपेभीउसकीफ़रावानीनहींजाती
हुजूम-ए-रंज-ओ-ग़मनेइसक़दरमुझकोरुलायाहै
किअबराहतकीसूरतमुझसेपहचानीनहींजाती
हुईथीइकख़तासरज़दसोउसकोमुद्दतेंगुज़रीं
मगरअबतकमिरेदिलसेपशेमानीनहींजाती
चमन-ज़ार-ए-तमन्नाकाफ़क़तइकफूलमुरझाया
उसीदिनसेमिरेगुलशनकीवीरानीनहींजाती
मिरेअश्कोंसेक्यानिस्बततुम्हेंअंजुम-ए-गर्दूं
किउनकीरोज़-ए-रौशनमेंभीताबानीनहींजाती
मिरीवहशतमेंशायदचलेअंदाज़-ए-रानाई
किज़ुल्फ़ोंकीतरहदिलकीपरेशानीनहींजाती
  - Jagdish Sahay Saxena
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