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Purnima Singh
zakham ijaad karke dekha hai
zakham ijaad karke dekha hai | ज़ख़्म ईजाद करके देखा है
- Purnima Singh
ज़ख़्म
ईजाद
करके
देखा
है
ख़ुद
को
बर्बाद
करके
देखा
है
मांगने
से
तो
कुछ
नहीं
मिलता
हम
ने
फ़रियाद
करके
देखा
है
कोई
फिर
लौट
कर
नहीं
आता
हम
ने
आज़ाद
करके
देखा
है
इक
अजब
सी
ख़ुशी
मिली
हमको
ख़ुद
को
नाशाद
करके
देखा
है
दिल
ने
ज़ख़्मों
की
बात
छेड़ी
थी
सो
तुझे
याद
करके
देखा
है
हिज्र
में
रक़्स
तजरिबा
है
इक
जो
तिरे
बाद
करके
देखा
है
ख़त्म
होती
नहीं
है
वीरानी
दिल
को
आबाद
करके
देखा
है
- Purnima Singh
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तू
परिंदा
है
किसी
शाख़
को
घर
कर
लेगा
जो
तेरे
हिज्र
का
मारा
है
किधर
जाएगा
Shadab Javed
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तुम्हारा
बैग
भी
तय्यार
कर
के
रक्खा
है
अकेली
हिज्र
के
आज़ार
क्यूँ
उठाऊँ
मैं
Zahraa Qarar
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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कितना
आसाँ
था
तिरे
हिज्र
में
मरना
जानाँ
फिर
भी
इक
उम्र
लगी
जान
से
जाते
जाते
Ahmad Faraz
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उस
हिज्र
पे
तोहमत
कि
जिसे
वस्ल
की
ज़िद
हो
उस
दर्द
पे
ला'नत
की
जो
अशआ'र
में
आ
जाए
Vipul Kumar
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जहाँ
जो
था
वहीं
रहना
था
उस
को
मगर
ये
लोग
हिजरत
कर
रहे
हैं
Liaqat Jafri
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मिरी
ज़िंदगी
तो
गुज़री
तिरे
हिज्र
के
सहारे
मिरी
मौत
को
भी
प्यारे
कोई
चाहिए
बहाना
Jigar Moradabadi
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियाँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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अमीर
इमाम
के
अश'आर
अपनी
पलकों
पर
तमाम
हिज्र
के
मारे
उठाए
फिरते
हैं
Ameer Imam
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रस्में
दुनिया
में
ढल
न
पाए
हम
साथ
में
इसके
चल
न
पाए
हम
सबकी
क़िस्मत
बदलते
देखी
है
अपनी
क़िस्मत
बदल
न
पाए
हम
सबको
वो
मिल
गया
मचलने
से
जिसकी
ख़ातिर
मचल
न
पाए
हम
बे
वफ़ाई
ने
उसकी
यूँँ
तोड़ा
कि
अभी
तक
सँभल
न
पाए
हम
सबको
छोड़ा
था
उसकी
ख़ातिर
पर
साथ
उसके
भी
चल
न
पाए
हम
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Purnima Singh
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यूँँ
ही
दिन
रात
ख़सारा
होगा
फिर
तो
मुश्किल
से
गुज़ारा
होगा
टूटे
ख़्वाबों
को
बना
करके
ग़ज़ल
उसने
पन्नों
पे
उतारा
होगा
एक
लहज़े
में
बिखर
कर
उसने
जाने
कितनों
को
सॅंवारा
होगा
तुझको
देखेंगे
किसी
और
के
साथ
हम
को
कैसे
ये
गवारा
होगा
ज़िंदगी
रास
हमें
आएगी
जब
वो
इक
शख़्स
हमारा
होगा
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Purnima Singh
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आप
मेरा
ख़याल
छोड़ो
नाॅं
दर्द
है
ला-ज़वाल
छोड़ो
नाॅं
हो
गया
जो
लिखा
था
क़िस्मत
में
क्या
करें
अब
मलाल
छोड़ो
नाॅं
भरते-भरते
ये
भर
ही
जाएगा
ज़ख़्म
की
देखभाल
छोड़ो
नाॅं
जाने
क्या
क्या
छुपा
हो
दरिया
में
आप
पानी
में
जाल
छोड़ो
नाॅं
रूह
को
नोचती
है
तन्हाई
जिस्म
है
बे
ख़याल
छोड़ो
नाॅं
एक
अरसे
से
मेरे
कमरे
का
है
शिकस्ता
सा
हाल
छोड़ो
नाॅं
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Purnima Singh
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