sawaad-e-hijr men rakha hua diya hooñ main | सवाद-ए-हिज्र में रक्खा हुआ दिया हूँ मैं

  - Iftikhar Mughal
सवाद-ए-हिज्रमेंरक्खाहुआदियाहूँमैं
तुझेख़बरनहींकिसआगमेंजलाहूँमैं
मैंक़र्याक़र्याफिरागर्द-बादबनकेजहाँ
उसीज़मीनपेपरचम-सिफ़तउठाहूँमैं
अभीछुटीनहींजन्नतकीधूलपाँवसे
हनूज़फ़र्श-ए-ज़मींपरनयानयाहूँमैं
हज़ारशुक्रहैकिख़ुदपेउस्तुवारथामैं
हज़ारशुक्रकिबुनियादपरगिराहूँमैं
मिरीशगुफ़्तकेमौसमअभीनहींआए
कहींकहींपेमगरफिरभीखिलगयाहूँमैं
मिरीशिकस्तभीहैरेख़्त'इफ़्तिख़ार-मुग़ल'
कियूँँहीबननेबिगड़नेमेंहीबनाहूँमैं
  - Iftikhar Mughal
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