fazaa men vahshat-e-sang-o-sinaan ke hote hue | फ़ज़ा में वहशत-ए-संग-ओ-सिनाँ के होते हुए

  - Iftikhar Arif
फ़ज़ामेंवहशत-ए-संग-ओ-सिनाँकेहोतेहुए
क़लमहैरक़्समेंआशोब-ए-जाँकेहोतेहुए
हमींमेंरहतेहैंवोलोगभीकिजिनकेसबब
ज़मींबुलंदहुईआसमाँकेहोतेहुए
ब-ज़िदहैदिलकिनएरास्तेनिकालेजाएँ
निशान-ए-रह-गुज़र-ए-रफ़्तगाँकेहोतेहुए
जहान-ए-ख़ैरमेंइकहुजरा-ए-क़नाअत-ओ-सब्र
ख़ुदाकरेकिरहेजिस्मजाँकेहोतेहुए
क़दमक़दमपेदिल-ए-ख़ुश-गुमाँनेखाईमात
रविशरविशनिगह-ए-मेहरबाँकेहोतेहुए
मैंएकसिलसिला-ए-आतिशींमेंबैअतथा
सोख़ाकहोगयानाम-ओ-निशाँकेहोतेहुए
मैंचुपरहाकिवज़ाहतसेबातबढ़जाती
हज़ारशेवा-ए-हुस्न-ए-बयाँकेहोतेहुए
उलझरहीथीहवाओंसेएककश्ती-ए-हर्फ़
पड़ीहैरेतपेआब-ए-रवाँकेहोतेहुए
बसएकख़्वाबकीसूरतकहींहैघरमेरा
मकाँकेहोतेहुएला-मकाँकेहोतेहुए
दु'आकोहातउठातेहुएलरज़ताहूँ
कभीदु'आनहींमाँगीथीमाँकेहोतेहुए
  - Iftikhar Arif
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