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Hrishita Singh
ye ab raushni aankhoñ men chubhti hai
ye ab raushni aankhoñ men chubhti hai | ये अब रौशनी आँखों में चुभती है
- Hrishita Singh
ये
अब
रौशनी
आँखों
में
चुभती
है
अँधेरा
ही
बस
अपना
सा
लगता
है
- Hrishita Singh
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अज़
कबीर-ओ-रंग-ए-केसर
और
गुलाल
अब्र
छाया
है
सफ़ेद-ओ-ज़र्द-ओ-लाल
Faez Dehlvi
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उम्र
गुज़री
है
माँजते
ख़ुद
को
साफ़
हैं
पर
चमक
नहीं
पाए
डाल
ने
फूल
की
तरह
पाला
ख़ार
थे
ना
महक
नहीं
पाए
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Vishal Bagh
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दिल
से
तो
हर
मोआ'मला
कर
के
चले
थे
साफ़
हम
कहने
में
उन
के
सामने
बात
बदल
बदल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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हज़ारों
क़ुमक़ुमों
से
जगमगाता
है
ये
घर
लेकिन
जो
मन
में
झाँक
के
देखूँ
तो
अब
भी
रौशनी
कम
है
Aanis Moin
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जाने
किस
किस
का
ख़याल
आया
है
इस
समुंदर
में
उबाल
आया
है
एक
बच्चा
था
हवा
का
झोंका
साफ़
पानी
को
खंगाल
आया
है
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Dushyant Kumar
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रौशनी
ऐसी
अजब
थी
रंग-भूमी
की
'नसीम'
हो
गए
किरदार
मुदग़म
कृष्ण
भी
राधा
लगा
Iftikhar Naseem
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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खिड़कियों
से
झाँकती
है
रौशनी
बत्तियाँ
जलती
हैं
घर
घर
रात
में
Mohammad Alvi
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जहाँ
रहेगा
वहीं
रौशनी
लुटाएगा
किसी
चराग़
का
अपना
मकाँ
नहीं
होता
Waseem Barelvi
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तुमने
मुड़कर
भी
देखा
नहीं
था
हमें
देखो
अब
किस
तरह
हम
हैं
बिखरे
हुए
Hrishita Singh
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इक
जुस्तजू
दीदार
के
तेरे
सिवा
कुछ
भी
नहीं
ऐसा
नहीं
उन
रास्तों
पर
अब
रुका
मैं
ही
नहीं
ज़द
में
किसी
दीवार
के
उलझी
रही
हो
रौशनी
कमरे
में
मेरे
रौशनी
भी
अब
बसर
करती
नहीं
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Hrishita Singh
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मेरी
दुनिया
जिस
में
सिमट
जाती
थी
तो
अब
उसके
कानों
में
बाली
न
हो
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Hrishita Singh
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मैं
तो
कमज़र्फ़
हूँ
और
तू
है
ज़की
लोगों
ने
मेरा
सच
फिर
तो
बातिल
किया
Hrishita Singh
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हम
सेे
मत
पूछो
हाल
ए
दिल
हमारा
अब
अब
हमारी
तबीअत
अच्छी
ख़ासी
है
Hrishita Singh
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