hi
0
Search
Shayari
Writers
Events
Blog
Store
Help
Login
By:
00:00/00:00
Hrishita Singh
meri qismat men to bas ik hi darwaaza hai
meri qismat men to bas ik hi darwaaza hai | मेरी क़िस्मत में तो बस इक ही दरवाज़ा है
- Hrishita Singh
मेरी
क़िस्मत
में
तो
बस
इक
ही
दरवाज़ा
है
और
वो
भी
बस
तेरे
आने
से
ही
खुलता
है
- Hrishita Singh
Download Sher Image
वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
Send
Download Image
38 Likes
मैं
ने
मेहनत
से
हथेली
पे
लकीरें
खींचीं
वो
जिन्हें
कातिब-ए-तक़दीर
नहीं
खींच
सका
Umair Najmi
Send
Download Image
49 Likes
ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
Read Full
Khurram Afaq
Send
Download Image
21 Likes
सितारे
कुछ
बताते
हैं
नतीजा
कुछ
निकलता
है
बड़ी
हैरत
में
हैं
मेरा
मुक़द्दर
देखने
वाले
Madan Mohan Danish
Send
Download Image
45 Likes
गर
डूबना
ही
अपना
मुक़द्दर
है
तो
सुनो
डूबेंगे
हम
ज़रूर
मगर
नाख़ुदा
के
साथ
Kaifi Azmi
Send
Download Image
24 Likes
मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
Send
Download Image
28 Likes
फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
Send
Download Image
57 Likes
कभी
पत्थर
मुक़द्दर
लिख
नहीं
सकता
मगर
समझो
जिसे
पत्थर
में
ढूँढो
हो
तुम्हारे
पास
ही
तो
है
Tanha
Send
Download Image
1 Like
किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
Send
Download Image
3 Likes
बी.ए
भी
पास
हों
मिले
बी-बी
भी
दिल-पसंद
मेहनत
की
है
वो
बात
ये
क़िस्मत
की
बात
है
Akbar Allahabadi
Send
Download Image
35 Likes
Read More
उसकी
ही
यादों
में
पड़ा
रहता
है
ये
ये
मेरा
दिल
भी
कैसा
पगला
गया
है
Hrishita Singh
Send
Download Image
2 Likes
देख
कर
तुम
भी
ज़ख़्म
मेरे
हो
हँसते
तुम
सेे
हमदर्दी
की
भी
हसरत
नहीं
है
Hrishita Singh
Send
Download Image
1 Like
सारे
आँगन
भी
चुप
हो
रहे
हैं
अब
तो
जंगल
भी
सब
रो
रहे
हैं
रूह
तो
कब
की
ही
मर
चुकी
है
अब
तो
हम
बस
बदन
ढो
रहे
हैं
सब
दरख़्तों
को
ये
काट
देते
फूल
गमलों
में
फिर
बो
रहे
हैं
रहते
कब
तक
उसी
वस्ल
में
हम
हिज्र
की
हम
वजह
हो
रहे
हैं
अब
नहीं
नींद
पूरी
मुनासिब
आधी
ही
नींद
बस
सो
रहे
हैं
सबकी
करते
थे
हम
ही
हिफ़ाज़त
अब
यहाँ
ख़ुद
ही
को
खो
रहे
हैं
ख़ाक
ही
तो
यहाँ
होते
हैं
सब
सब
सिकंदर
यहाँ
जो
रहे
हैं
ये
जो
आलम
मुनासिब
नहीं
था
हम
भी
इसकी
तरह
हो
रहे
हैं
Read Full
Hrishita Singh
Download Image
2 Likes
बीनाई
आँखों
की
भी
जा
चुकी
है
बस
सपने
भी
सजाए
फिर
रहे
हैं
बातों
में
अपनी
रखते
थे
उसे
हम
बातों
में
जिसकी
आए
फिर
रहे
हैं
Read Full
Hrishita Singh
Send
Download Image
1 Like
तुम
न
आए
फ़ज़ा
भी
ये
रूखी
सी
थी
तुम
जो
आओ
तो
गीतों
को
भी
सुर
मिले
जब
निहारा
था
तुमने
तो
सँवरी
थी
मैं
फेरी
जब
से
नज़र
तो
उजड़ने
लगे
Read Full
Hrishita Singh
Send
Download Image
0 Likes
Read More
Akbar Allahabadi
Krishna Bihari Noor
Shariq Kaifi
Mohammad Alvi
Anjum Rehbar
Abhishar Geeta Shukla
Ali Zaryoun
Zehra Nigaah
Amjad Islam Amjad
Asad Bhopali
Get Shayari on your Whatsapp
Kiss Shayari
Happy New Year Shayari
Insaan Shayari
Aadmi Shayari
Wajood Shayari