watan ko kuchh nahin khatra nizaam-e-zar hai khatre men | वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में

  - Habib Jalib
वतनकोकुछनहींख़तरानिज़ाम-ए-ज़रहैख़तरेमें
हक़ीक़तमेंजोरहज़नहैवहीरहबरहैख़तरेमें
जोबैठाहैसफ़-ए-मातमबिछाएमर्ग-ए-ज़ुल्मतपर
वोनौहागरहैख़तरेमेंवोदानिश-वरहैख़तरेमें
अगरतशवीशलाहक़हैतोसुलतानोंकोलाहक़है
तेराघरहैख़तरेमेंमेराघरहैख़तरेमें
जहाँ'इक़बाल'भीनज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़हो'जालिब'
वहाँतुझकोशिकायतहैतिराजौहरहैख़तरेमें
  - Habib Jalib
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