dil par jo zakham hain vo dikhaayen kisi ko kya | दिल पर जो ज़ख़्म हैं वो दिखाएँ किसी को क्या

  - Habib Jalib
दिलपरजोज़ख़्महैंवोदिखाएँकिसीकोक्या
अपनाशरीक-ए-दर्दबनाएँकिसीकोक्या
हरशख़्सअपनेअपनेग़मोंमेंहैमुब्तला
ज़िंदाँमेंअपनेसाथरुलाएँकिसीकोक्या
बिछड़ेहुएवोयारवोछोड़ेहुएदयार
रहरहकेहमकोयादजोआएँकिसीकोक्या
रोनेकोअपनेहालपेतन्हाईहैबहुत
उसअंजुमनमेंख़ुदपेहँसाएंकिसीकोक्या
वोबातछेड़जिसमेंझलकताहोसबकाग़म
यादेंकिसीकीतुझकोसताएंकिसीकोक्या
सोएहुएहैंलोगतोहोंगेसुकूनसे
हमजागनेकारोगलगाएँकिसीकोक्या
'जालिब'आएगाकोईअहवालपूछने
देंशहर-ए-बे-हिसाँमेंसदाएँकिसीकोक्या
  - Habib Jalib
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