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George Puech Shor
paik-e-khyaal bhi hai ajab kya jahaan-numa
paik-e-khyaal bhi hai ajab kya jahaan-numa | पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा
- George Puech Shor
पैक-ए-ख़याल
भी
है
अजब
क्या
जहाँ-नुमा
आया
नज़र
वो
पास
जो
अपने
से
दूर
था
उस
माह-रू
पे
आँख
किसी
की
न
पड़
सकी
जल्वा
था
तूर
का
कि
सरासर
वो
नूर
था
देते
न
दिल
जो
तुम
को
तो
क्यूँँ
बनती
जान
पर
कुछ
आप
की
ख़ता
न
थी
अपना
क़ुसूर
था
ज़र्रे
की
तरह
ख़ाक
में
पामाल
हो
गए
वो
जिन
का
आसमाँ
पे
सर-ए-पुर-ग़ुरूर
था
- George Puech Shor
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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दिल्ली
के
न
थे
कूचे
औराक़-ए-मुसव्वर
थे
जो
शक्ल
नज़र
आई
तस्वीर
नज़र
आई
Meer Taqi Meer
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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न
कोई
बीन
बजाई
न
टोकरी
खोली
बस
एक
फोन
मिलाने
पे
साँप
बैठा
है
कोई
भी
लड़की
अकेली
नज़र
नहीं
आती
यहाँ
हर
एक
ख़जाने
पे
साँप
बैठा
है
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Muzdum Khan
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हुस्न
सब
को
ख़ुदा
नहीं
देता
हर
किसी
की
नज़र
नहीं
होती
Ibn E Insha
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बात
इतनी
सी
है
मेरे
हम
दम
तू
नज़र
आया
जब
जिधर
देखा
D Faiz Khan
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वो
दिल-नवाज़
है
लेकिन
नज़र-शनास
नहीं
मिरा
इलाज
मिरे
चारा-गर
के
पास
नहीं
Nasir Kazmi
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दिलों
की
बातें
दिलों
के
अंदर
ज़रा
सी
ज़िद
से
दबी
हुई
हैं
वो
सुनना
चाहें,
ज़ुबां
से
सब
कुछ
मैं
करना
चाहूँ
नज़र
से
बतियां
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है
सुलगती
सांसें,
तरसती
आँखें,
मचलती
रूहें,
धड़कती
छतियां
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Aalok Shrivastav
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ले
दे
के
अपने
पास
फ़क़त
इक
नज़र
तो
है
क्यूँँ
देखें
ज़िंदगी
को
किसी
की
नज़र
से
हम
Sahir Ludhianvi
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रुके
है
आमद-ओ-शुद
में
नफ़स
नहीं
चलता
यही
है
हुक्म-ए-इलाही
तो
बस
नहीं
चलता
हवा
के
घोड़े
पे
रहता
है
वो
सवार
मुदाम
किसी
का
उस
के
बराबर
फ़रस
नहीं
चलता
गुज़िश्ता
साल
जो
देखा
वो
अब
के
साल
नहीं
ज़माना
एक
सा
बस
हर
बरस
नहीं
चलता
नहीं
है
टूटे
की
बूटी
जहान
में
पैदा
शिकस्ता
जब
हुआ
तार-ए-नफ़स
नहीं
चलता
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George Puech Shor
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ये
फ़र्क़
जीते
ही
जी
तक
गदा-ओ-शाह
में
है
वगर्ना
बा'द-ए-फ़ना
मुश्त-ए-ख़ाक
राह
में
है
निशाँ
मक़ाम
का
ग़म
और
न
रहनुमा
कोई
ग़रज़
कि
सख़्त
अज़िय्यत
अदम
की
राह
में
है
गदा
ने
छोड़
के
दुनिया
को
नक़्द-ए-दीं
पाया
भला
ये
लुत्फ़
कहाँ
शह
के
इज़्ज़-ओ-जाह
में
है
पसंद-तब्अ
नहीं
अपनी
चार
दिन
का
मिलाप
मज़ा
तो
ज़ीस्त
का
ऐ
मेरी
जाँ
निबाह
में
है
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George Puech Shor
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