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George Puech Shor
ruke hai aamad-o-shud men nafs nahin chaltaa
ruke hai aamad-o-shud men nafs nahin chaltaa | रुके है आमद-ओ-शुद में नफ़स नहीं चलता
- George Puech Shor
रुके
है
आमद-ओ-शुद
में
नफ़स
नहीं
चलता
यही
है
हुक्म-ए-इलाही
तो
बस
नहीं
चलता
हवा
के
घोड़े
पे
रहता
है
वो
सवार
मुदाम
किसी
का
उस
के
बराबर
फ़रस
नहीं
चलता
गुज़िश्ता
साल
जो
देखा
वो
अब
के
साल
नहीं
ज़माना
एक
सा
बस
हर
बरस
नहीं
चलता
नहीं
है
टूटे
की
बूटी
जहान
में
पैदा
शिकस्ता
जब
हुआ
तार-ए-नफ़स
नहीं
चलता
- George Puech Shor
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आग
अपने
ही
लगा
सकते
हैं
ग़ैर
तो
सिर्फ़
हवा
देते
हैं
Mohammad Alvi
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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जहाँ
सारे
हवा
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
वहाँ
भी
हम
दिया
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
Abbas Qamar
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इस
नदी
की
धार
में
ठंडी
हवा
आती
तो
है
नाव
जर्जर
ही
सही,
लहरों
से
टकराती
तो
है
Dushyant Kumar
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क़फ़स
को
तोड़
के
जब
भी
असीर
निकलेगा
हमारे
खोल
के
अंदर
से
मीर
निकलेगा
धुआँ
है
राख
है
और
ढ़ेर
है
चिताओं
का
यहीं
से
नाचता
गाता
कबीर
निकलेगा
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Vishnu virat
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दिया
बुझ
जाए
तो
अचरज
नहीं
है
हवा
का
रुख
बदलता
जा
रहा
है
Atul K Rai
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बेहतर
है
मेरे
जाम
में
अब
ज़हर
मिला
दो
तुम
यूँँ
तो
मेरी
प्यास
को
कम
कर
नहीं
सकते
Saad Zaigham
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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देख
तो
दिल
कि
जाँ
से
उठता
है
ये
धुआँ
सा
कहाँ
से
उठता
है
गोर
किस
दिलजले
की
है
ये
फ़लक
शोला
इक
सुब्ह
यां
से
उठता
है
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Meer Taqi Meer
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ये
फ़र्क़
जीते
ही
जी
तक
गदा-ओ-शाह
में
है
वगर्ना
बा'द-ए-फ़ना
मुश्त-ए-ख़ाक
राह
में
है
निशाँ
मक़ाम
का
ग़म
और
न
रहनुमा
कोई
ग़रज़
कि
सख़्त
अज़िय्यत
अदम
की
राह
में
है
गदा
ने
छोड़
के
दुनिया
को
नक़्द-ए-दीं
पाया
भला
ये
लुत्फ़
कहाँ
शह
के
इज़्ज़-ओ-जाह
में
है
पसंद-तब्अ
नहीं
अपनी
चार
दिन
का
मिलाप
मज़ा
तो
ज़ीस्त
का
ऐ
मेरी
जाँ
निबाह
में
है
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George Puech Shor
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पैक-ए-ख़याल
भी
है
अजब
क्या
जहाँ-नुमा
आया
नज़र
वो
पास
जो
अपने
से
दूर
था
उस
माह-रू
पे
आँख
किसी
की
न
पड़
सकी
जल्वा
था
तूर
का
कि
सरासर
वो
नूर
था
देते
न
दिल
जो
तुम
को
तो
क्यूँँ
बनती
जान
पर
कुछ
आप
की
ख़ता
न
थी
अपना
क़ुसूर
था
ज़र्रे
की
तरह
ख़ाक
में
पामाल
हो
गए
वो
जिन
का
आसमाँ
पे
सर-ए-पुर-ग़ुरूर
था
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George Puech Shor
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