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Fuzail Jafri
ghar se be-zaar hooñ college men tabi'at na lage
ghar se be-zaar hooñ college men tabi'at na lage | घर से बे-ज़ार हूँ कॉलेज में तबीअ'त न लगे
- Fuzail Jafri
घर
से
बे-ज़ार
हूँ
कॉलेज
में
तबीअ'त
न
लगे
इतनी
अच्छी
भी
किसी
शख़्स
की
सूरत
न
लगे
एक
इक
इंच
पे
उस
जिस्म
के
सत्तर
सत्तर
बोसे
लीजे
तो
भला
क्यूँँ
वो
क़यामत
न
लगे
ज़हर
मीठा
हो
तो
पीने
में
मज़ा
आता
है
बात
सच
कहिए
मगर
यूँँ
कि
हक़ीक़त
न
लगे
आईना-अक्स
मिरे
हाथ
तजल्ली
ग़ाएब
मेरे
दुश्मन
को
भी
या-रब
मिरी
आदत
न
लगे
- Fuzail Jafri
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सच
तो
ये
है
'मजाज़'
की
दुनिया
हुस्न
और
इश्क़
के
सिवा
क्या
है
Asrar Ul Haq Majaz
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जिस्म
चादर
सा
बिछ
गया
होगा
रूह
सिलवट
हटा
रही
होगी
Kumar Vishwas
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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अच्छी
बुरी
हर
इक
कमी
के
साथ
हैं
हम
यार
आँखों
की
नमी
के
साथ
हैं
दो
जिस्म
ब्याहे
जा
रहे
हैं
आज
भी
हम
सब
पराए
आदमी
के
साथ
हैं
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Neeraj Neer
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है
उस
बदन
की
लत
मुझे
सो
दूसरा
बदन
अच्छा
तो
लग
रहा
है
मेरे
काम
का
नहीं
Vishnu virat
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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इसी
कारण
से
मैं
उसका
बदन
छूता
नहीं
यारों
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
में
वो
लिक्खा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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इसीलिए
तो
हिफ़ाज़त
में
बैठा
रहता
हूँ
मेरे
बदन
में
कोई
नीम
जान
रहता
है
Nirmal Nadeem
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निभेगी
किस
तरह
दिल
सोचता
है
अजब
लड़की
है
जब
देखो
ख़फ़ा
है
ब-ज़ाहिर
है
उसे
भी
प्यार
वैसे
दिलों
के
भेद
से
वाक़िफ़
ख़ुदा
है
ये
तन्हाई
का
काला
सर्द
पत्थर
इसी
से
उम्र-भर
सर
फोड़ना
है
मगर
इक
बात
दोनों
जानते
हैं
न
कुछ
उस
ने
न
कुछ
हम
ने
कहा
है
नहीं
मुमकिन
अगर
साथ
उम्र-भर
का
ये
पल-दो-पल
का
मिलना
क्या
बुरा
है
घने
जंगल
में
जैसे
शाम
उतरे
कोई
यूँँ
'जाफ़री'
याद
आ
रहा
है
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Fuzail Jafri
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सर-ए-सहरा-ए-दुनिया
फूल
यूँँ
ही
तो
नहीं
खिलते
दिलों
को
जीतना
पड़ता
है
तोहफ़े
में
नहीं
मिलते
ये
क्या
मंज़र
है
जैसे
सो
गई
हों
सोच
की
लहरें
ये
कैसी
शाम-ए-तन्हाई
है
पत्ते
तक
नहीं
हिलते
मज़ा
जब
था
कि
बोतल
से
उबलती
फैलती
रुत
में
धुआँ
साँसों
से
उठता
गर्म
बोसों
से
बदन
छिलते
जो
भर
भी
जाएँ
दिल
के
ज़ख़्म
दिल
वैसा
नहीं
रहता
कुछ
ऐसे
चाक
होते
हैं
जो
जुड़
कर
भी
नहीं
सिलते
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Fuzail Jafri
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निभेगी
किस
तरह
दिल
सोचता
है
अजब
लड़की
है
जब
देखो
ख़फ़ा
है
Fuzail Jafri
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चमकते
चाँद
से
चेहरों
के
मंज़र
से
निकल
आए
ख़ुदा
हाफ़िज़
कहा
बोसा
लिया
घर
से
निकल
आए
ये
सच
है
हम
को
भी
खोने
पड़े
कुछ
ख़्वाब
कुछ
रिश्ते
ख़ुशी
इस
की
है
लेकिन
हल्क़ा-ए-शर
से
निकल
आए
अगर
सब
सोने
वाले
मर्द
औरत
पाक-तीनत
थे
तो
इतने
जानवर
किस
तरह
बिस्तर
से
निकल
आए
दिखाई
दे
न
दे
लेकिन
हक़ीक़त
फिर
हक़ीक़त
है
अँधेरे
रौशनी
बन
कर
समुंदर
से
निकल
आए
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Fuzail Jafri
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