aurat hooñ magar soorat-e-kohsaar khadi hooñ | औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ

  - Farhat Zahid
औरतहूँमगरसूरत-ए-कोहसारखड़ीहूँ
इकसचकेतहफ़्फ़ुज़केलिएसबसेलड़ीहूँ
वोमुझसेसितारोंकापतापूछरहाहै
पत्थरकीतरहजिसकीअँगूठीमेंजड़ीहूँ
अल्फ़ाज़आवाज़हमराज़दम-साज़
येकैसेदोराहेपेमैंख़ामोशखड़ीहूँ
इसदश्त-ए-बलामेंसमझख़ुदकोअकेला
मैंचोबकीसूरततिरेखे़
मेंमेंगड़ीहूँ
फूलोंपेबरसतीहूँकभीसूरत-ए-शबनम
बदलीहुईरुतमेंकभीसावनकीझड़ीहूँ
  - Farhat Zahid
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