ghamon ki bheed ne kuchla hai mujh ko shaadmaani men | ग़मों की भीड़ ने कुचला है मुझ को शादमानी में

  - Faiz rahil Khan
ग़मोंकीभीड़नेकुचलाहैमुझकोशादमानीमें
लगानाचाहताथातिश्नगीकीआगपानीमें
हरइकशयउड़गईमेरीहवाओंकीरवानीसे
सिमटकेरहगईख़्वाहिशवफ़ाओंकीजवानीमें
हमेशाचश्ममेंरहनामुझेअच्छानहींलगता
मैंरहनाचाहताहूँसमुंदरतेरेपानीमें
तिरीबस्तीकेमुजरेसेतिरीऔक़ातक्यापूछूँ
गधेभीशे'रबनजातेअपनीमेज़बानीमें
मैंपढ़करहोशखोबैठातिरेक़िस्सेकोफ़ुर्क़त
मोहब्बतकानशाहैइसशब-ए-ग़मकीकहानीमें
वोपीलीओढ़नीवालीअभीभीदिलमेंरहतीहै
येलड़काखोगयाहैउसकेरंग-ए-ज़ाफ़रानीमें
वोजिसदिन'फ़ैज़'आएगीमेरीचौखटपेमिलनेको
उसीदिनमो'जिज़ाहोगामिरीभीज़िंदगानीमें
  - Faiz rahil Khan
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