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Sushrut Tiwari
ek khatm nahin hota ki rag-e-jaan dabane ko
ek khatm nahin hota ki rag-e-jaan dabane ko | एक ख़त्म नहीं होता कि रग-ए-जां दबाने को
- Sushrut Tiwari
एक
ख़त्म
नहीं
होता
कि
रग-ए-जां
दबाने
को
कोई
नया
मसअला
तैयार
रहता
है
जाने
तू
कैसी
अदालत
का
मुंसिफ़
है
तेरी
निगाह
में
हर
शख़्स
गुनहगार
रहता
है
- Sushrut Tiwari
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दिल-ए-नादाँ
तुझे
हुआ
क्या
है
आख़िर
इस
दर्द
की
दवा
क्या
है
Mirza Ghalib
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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अब
मिरा
ध्यान
कहीं
और
चला
जाता
है
अब
कोई
फ़िल्म
मुकम्मल
नहीं
देखी
जाती
Jawwad Sheikh
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किसी
बहाने
से
उसकी
नाराज़गी
ख़त्म
तो
करनी
थी
उसके
पसंदीदा
शाइर
के
शे'र
उसे
भिजवाए
हैं
Ali Zaryoun
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चलता
रहने
दो
मियाँ
सिलसिला
दिलदारी
का
आशिक़ी
दीन
नहीं
है
कि
मुकम्मल
हो
जाए
Abbas Tabish
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फ़र्क़
इतना
है
कि
तू
पर्दे
में
और
मैं
बे-हिजाब
वर्ना
मैं
अक्स-ए-मुकम्मल
हूँ
तिरी
तस्वीर
का
Asad Bhopali
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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कीजे
इज़हार-ए-मोहब्बत
चाहे
जो
अंजाम
हो
ज़िंदगी
में
ज़िंदगी
जैसा
कोई
तो
काम
हो
Priyamvada ilhan
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अक़्ल
पे
बेहोशी
का
पर्दा
डाल
रखा
है
नाहक़
ही
तेरा
दर्द
संभाल
रखा
है
है
खोटा
जो
बाज़ार-ए-इश्क़
में
हमने
सिक्का
तेरे
नाम
का
उछाल
रखा
है
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Sushrut Tiwari
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इश्क़
और
हवस,
दो
अलग
बातें
हैं
पनाह
और
क़फ़स,
दो
अलग
बातें
हैं
है
सारा
ग़म
यही
कि
दुनिया
की
बातों
में
मैं
और
तू
हमनफ़स,
दो
अलग
बातें
हैं
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Sushrut Tiwari
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वाकिफ़
ज़रूर
मेरी
अज़ीयत
से
होगा
एक
दिन
उसका
सामना
हक़ीक़त
से
होगा
हाल
नहीं
पूछते,
ख़ुद
को
देख
लेते
हैं
हम
जो
हैं
बर्बाद,
वो
ख़ैरियत
से
होगा
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Sushrut Tiwari
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बमुश्किल
उसकी
गली
से
राह
मोड़
लेता
हूँ
अँधेरा
साथ
लेता
हूँ,
रोशनी
छोड़
देता
हूँ
किसी
दिन
चली
आना
पैदल
ही
मेरे
घर
जाओगी
तो
कहूंगा,
चलो,
मैं
छोड़
देता
हूँ
नई
इब्तिदास
इस
क़दर
ख़ौफ़
है
मुझको
मक़्ता
लिख
लेता
हूँ,
मतला
छोड़
देता
हूँ
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Sushrut Tiwari
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कोई
दर्द
नहीं,
कोई
दु'आ
भी
नहीं
पत्थरों
को
कभी
कुछ
हुआ
भी
नहीं
सज़ा
हो
गई
उसको
ता'उम्र
क़ैद
की
वो
फ़रियादी
जिसकी
ख़ता
भी
नहीं
हमको
देखना
आकर,
तुम्हें
मालूम
होगा
तुम
सेे
क़त्ल
हो
गया
है,
तुम्हें
पता
भी
नहीं
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Sushrut Tiwari
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