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Sushrut Tiwari
aql pe behoshi ka parda daal rakha hai
aql pe behoshi ka parda daal rakha hai | अक़्ल पे बेहोशी का पर्दा डाल रखा है
- Sushrut Tiwari
अक़्ल
पे
बेहोशी
का
पर्दा
डाल
रखा
है
नाहक़
ही
तेरा
दर्द
संभाल
रखा
है
है
खोटा
जो
बाज़ार-ए-इश्क़
में
हमने
सिक्का
तेरे
नाम
का
उछाल
रखा
है
- Sushrut Tiwari
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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एक
दिन
की
ख़ुराक
है
मेरी
आप
के
हैं
जो
पूरे
साल
के
दुख
Varun Anand
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अब
जो
कोई
पूछे
भी
तो
उस
से
क्या
शरह-ए-हालात
करें
दिल
ठहरे
तो
दर्द
सुनाएँ
दर्द
थमें
तो
बात
करें
Faiz Ahmad Faiz
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हमारी
उम्र
के
लड़के
ग़ज़ल
तो
लिख
रहे
हैं
पर
ये
इतना
दर्द
लेके
जी
रहे
हैं
ठीक
थोड़ी
है
Ramesh Singh
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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पास
जब
तक
वो
रहे
दर्द
थमा
रहता
है
फैलता
जाता
है
फिर
आँख
के
काजल
की
तरह
Parveen Shakir
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ये
मयख़ाने
में
बैठ
अफ़सोस
अब
क्यूँ
तेरे
हिस्से
भी
तो
जवानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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रात
भर
दर्द
की
शम्अ
जलती
रही
ग़म
की
लौ
थरथराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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दर्द
ऐसा
नजरअंदाज
नहीं
कर
सकते
जब्त
ऐसा
की
हम
आवाज
नहीं
कर
सकते
बात
तो
तब
थी
कि
तू
छोड़
के
जाता
ही
नहीं
अब
तेरे
मिलने
पे
हम
नाज
नहीं
कर
सकते
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Ismail Raaz
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वो
सर
भी
काट
देता
तो
होता
न
कुछ
मलाल
अफ़्सोस
ये
है
उस
ने
मेरी
बात
काट
दी
Tahir Faraz
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कोई
दर्द
नहीं,
कोई
दु'आ
भी
नहीं
पत्थरों
को
कभी
कुछ
हुआ
भी
नहीं
सज़ा
हो
गई
उसको
ता'उम्र
क़ैद
की
वो
फ़रियादी
जिसकी
ख़ता
भी
नहीं
हमको
देखना
आकर,
तुम्हें
मालूम
होगा
तुम
सेे
क़त्ल
हो
गया
है,
तुम्हें
पता
भी
नहीं
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Sushrut Tiwari
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बमुश्किल
उसकी
गली
से
राह
मोड़
लेता
हूँ
अँधेरा
साथ
लेता
हूँ,
रोशनी
छोड़
देता
हूँ
किसी
दिन
चली
आना
पैदल
ही
मेरे
घर
जाओगी
तो
कहूंगा,
चलो,
मैं
छोड़
देता
हूँ
नई
इब्तिदास
इस
क़दर
ख़ौफ़
है
मुझको
मक़्ता
लिख
लेता
हूँ,
मतला
छोड़
देता
हूँ
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Sushrut Tiwari
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वाकिफ़
ज़रूर
मेरी
अज़ीयत
से
होगा
एक
दिन
उसका
सामना
हक़ीक़त
से
होगा
हाल
नहीं
पूछते,
ख़ुद
को
देख
लेते
हैं
हम
जो
हैं
बर्बाद,
वो
ख़ैरियत
से
होगा
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Sushrut Tiwari
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इश्क़
और
हवस,
दो
अलग
बातें
हैं
पनाह
और
क़फ़स,
दो
अलग
बातें
हैं
है
सारा
ग़म
यही
कि
दुनिया
की
बातों
में
मैं
और
तू
हमनफ़स,
दो
अलग
बातें
हैं
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Sushrut Tiwari
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एक
ख़त्म
नहीं
होता
कि
रग-ए-जां
दबाने
को
कोई
नया
मसअला
तैयार
रहता
है
जाने
तू
कैसी
अदालत
का
मुंसिफ़
है
तेरी
निगाह
में
हर
शख़्स
गुनहगार
रहता
है
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Sushrut Tiwari
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