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Ejaz Ali Arshad
jab bhi us ka khayal karta hooñ
jab bhi us ka khayal karta hooñ | जब भी उस का ख़याल करता हूँ
- Ejaz Ali Arshad
जब
भी
उस
का
ख़याल
करता
हूँ
अपनी
ग़ज़लों
में
रंग
भरता
हूँ
शहरस
उस
के
जब
गुज़रता
हूँ
ख़ुद-बख़ुद
टूटता
बिखरता
हूँ
देखता
हूँ
बुलंदियों
की
तरफ़
सीढ़ियाँ
जब
कभी
उतरता
हूँ
आप
डरते
हैं
अपने
दुश्मन
से
और
मैं
दोस्तों
से
डरता
हूँ
ज़ालिमों
से
तुझे
करम
की
उमीद
मैं
तिरी
सादगी
पे
मरता
हूँ
मैं
मुसाफ़िर
हूँ
धूप
का
'अरशद'
मैं
कहाँ
छाँव
में
ठहरता
हूँ
- Ejaz Ali Arshad
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लौट
कर
नहीं
आता
कब्र
से
कोई
लेकिन
प्यार
करने
वालों
को
इंतज़ार
रहता
है
Shabeena Adeeb
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जब
बुलंदी
का
गुमाँ
था
तो
नहीं
याद
आई
अपनी
परवाज़
से
टूटे
तो
ज़मीं
याद
आई
वही
आँखें
कि
जो
ईमान-शिकन
आँखें
हैं
उन्हीं
आँखों
की
हमें
दावत-ए-दीं
याद
आई
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Subhan Asad
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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क्या
सितम
है
कि
अब
तिरी
सूरत
ग़ौर
करने
पे
याद
आती
है
Jaun Elia
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ख़ुद
को
मसरूफ़
किए
रखने
की
कोशिश
करना
क्या
तेरी
याद
के
ज़ुमरे
में
नहीं
आता
है
Jawwad Sheikh
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अब
तो
उन
की
याद
भी
आती
नहीं
कितनी
तन्हा
हो
गईं
तन्हाइयाँ
Firaq Gorakhpuri
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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'अमीर'
अब
हिचकियाँ
आने
लगी
हैं
कहीं
मैं
याद
फ़रमाया
गया
हूँ
Ameer Minai
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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भीड़
चारों
तरफ़
मगर
तन्हा
लोग
रहते
हैं
उम्र
भर
तन्हा
कारवाँ
कारवाँ
हर
इक
मंज़र
आदमी
आदमी
मगर
तन्हा
सैकड़ों
क़ाफ़िले
गुज़रते
हैं
और
रहती
है
रहगुज़र
तन्हा
अब
मुहाफ़िज़
भी
लूट
लेते
हैं
छोड़
कर
जाइए
न
घर
तन्हा
रोज़
मिलता
हूँ
सैकड़ों
से
मगर
रोज़
जाता
हूँ
अपने
घर
तन्हा
दोस्तों
की
तलाश
में
'अरशद'
लौट
कर
आ
गई
नज़र
तन्हा
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Ejaz Ali Arshad
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