aur ab aql ka baar nahin gar sah sakte ho | और अब अक़्ल का बार नहीं गर सह सकते हो

  - Ehtisham ul Haq Siddiqui
औरअबअक़्लकाबारनहींगरसहसकतेहो
दिलकेइसपागल-ख़ानेमेंरहसकतेहो
मेरेदिलमेंरहनारासनहींआयातो
बे-शकआँखसेआँसूबनकरबहसकतेहो
तुमसर-ता-पाआगहोमैंहूँटोटलपानी
साफ़हैमेरेसाथनहींतुमरहसकतेहो
पत्थर-वत्थरज़ालिम-वालिमबेहिस-वेहस
मुझकोजोभीकहनाचाहोकहसकतेहो
मिट्टीहोतातोपीजातापरशीशाहूँ
मेरेऊपरबे-फ़िक्रीसेबहसकतेहो
  - Ehtisham ul Haq Siddiqui
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