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Dipendra Singh 'Raaz'
jamaat-e-ishq men shaair bane the
jamaat-e-ishq men shaair bane the | जमात-ए-इश्क़ में शाइर बने थे
- Dipendra Singh 'Raaz'
जमात-ए-इश्क़
में
शाइर
बने
थे
निसाबों
में
लिखा
था
शे'र
पढ़ना
- Dipendra Singh 'Raaz'
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'आशिक़
का
ख़त
है
पढ़ना
ज़रा
देख-भाल
के
काग़ज़
पे
रख
दिया
है
कलेजा
निकाल
के
LALA RAKHA RAM BARQ
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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तुम
को
तो
बस
हुस्न
के
नंबर
मिलते
हैं
उसका
सोचो
जिसको
पढ़ना
पड़ता
है
Kafeel Rana
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हमारे
शहर
के
लोगों
का
अब
अहवाल
इतना
है
कभी
अख़बार
पढ़
लेना
कभी
अख़बार
हो
जाना
Ada Jafarey
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कई
शे'र
पढ़
कर
है
ये
बात
जानी
कोई
शे'र
उसके
मुक़ाबिल
नहीं
है
Alankrat Srivastava
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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एक
ग़ज़ल
से
जिसकी
मूरत
मैंने
आज
बनाई
है
एक
दफ़ा
जो
वो
पढ़
ले
तो
प्राण
प्रतिष्ठा
हो
जाए
Tanoj Dadhich
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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हमें
पढ़ाओ
न
रिश्तों
की
कोई
और
किताब
पढ़ी
है
बाप
के
चेहरे
की
झुर्रियाँ
हम
ने
Meraj Faizabadi
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वो
अपने
ज़ेहन
में
रखती
थी
पहले
मुझको
फिर
वो
मेरा
नाम
बनाती
थी
अपने
हाथों
पे
Dipendra Singh 'Raaz'
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लगता
है
उसने
मान
ली
है
अब
बड़ों
की
बात
मेरी
मज़ार
पर
नहीं
आती
वो
आजकल
Dipendra Singh 'Raaz'
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सतह
से
तह
तलक
होना
पड़ेगा
गर्क
ही
तुमको
समुंदर
के
किनारे
पर
कभी
मोती
नहीं
मिलते
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुमने
उस
मोड़
पे
छोड़ा
है
के
अब
लगता
है
इस
से
अच्छा
था
के
मिलते
ही
बिछड़
जाते
हम
Dipendra Singh 'Raaz'
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गिला
उस
सेे
भला
किस
बात
का
अब
मैं
करूँँ
यारों
ख़ुदा
ने
ही
मुकद्दर
में
मुहब्बत
जब
नहीं
लिक्खी
Dipendra Singh 'Raaz'
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