sapnon ki dhaara men bahta rehta hooñ | सपनों की धारा में बहता रहता हूँ

  - Dilkash Sagari
सपनोंकीधारामेंबहतारहताहूँ
शब्दोंकेआकारबदलतारहताहूँ
हालसेमुस्तक़बिलसेआँखेंबंदकिए
माज़ीकीदहलीज़पेसोतारहताहूँ
उनसेतेरीशक्लनहींमिलतीफिरभी
फूलोंसेदिन-रातझगड़तारहताहूँ
बाहरघुपअँधियारागूँगेबहरेलोग
अपनेआपसेबातेंकरतारहताहूँ
मैंहूँसरसेपातकज़हर-भरा'सागर'
ख़ुदहीअपनेजिस्मकोडसतारहताहूँ
  - Dilkash Sagari
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