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Dhiraj Singh 'Tahammul'
ishaaron hi men haal-e-dil main saara khol jaata hooñ
ishaaron hi men haal-e-dil main saara khol jaata hooñ | इशारों ही में हाल-ए-दिल मैं सारा खोल जाता हूँ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
इशारों
ही
में
हाल-ए-दिल
मैं
सारा
खोल
जाता
हूँ
बहुत
ख़ामोश
रहकर
भी
बहुत
कुछ
बोल
जाता
हूँ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वो
बहुत
दूर
है
मगर
मिरे
पास
एक
ही
सम्त
का
कराया
है
Idris Babar
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पा
के
तूफ़ां
का
इशारा
दरिया
तोड़
देता
है
किनारा
दरिया
Abdul Mannan Tarzi
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दूर
साहिल
से
कोई
शोख़
इशारा
भी
नहीं
डूबने
वाले
को
तिनके
का
सहारा
भी
नहीं
Junaid Hazin Lari
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भाँप
ही
लेंगे
इशारा
सर-ए-महफ़िल
जो
किया
ताड़ने
वाले
क़यामत
की
नज़र
रखते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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उसकी
बस्ती
से
पहले
कब्रिस्तान
आशिकों
के
लिए
इशारा
था
Unknown
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जो
उस
तरफ़
से
इशारा
कभी
किया
उस
ने
मैं
डूब
जाऊंगा
दरिया
को
पार
करते
हुए
Ghulam Murtaza Rahi
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वो
तड़प
जाए
इशारा
कोई
ऐसा
देना
उस
को
ख़त
लिखना
तो
मेरा
भी
हवाला
देना
Azhar Inayati
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है
देखने
वालों
को
सँभलने
का
इशारा
थोड़ी
सी
नक़ाब
आज
वो
सरकाए
हुए
हैं
Arsh Malsiyani
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आपको
अकसर
खड़े
होकर
किनारे
देखते
हैं
डूबते
जाते
हैं
तिनकों
के
सहारे
देखते
हैं
देखते
हैं
देखने
वाले
न
जाने
आप
में
क्या
हम
हमारी
क़त्ल
के
मौज़ूँ
इशारे
देखते
हैं
हो
भला
गुस्ताख़
कैसे
अस्मत-ए-मरियम
में
कोई
चाँद
है
लुकता
हिजाबों
से
सितारे
देखते
हैं
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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चराग़ाँ
ढूँढते
हैं
आतिश-ए-दिल
को
बुझाने
को
मुहब्बत
की
समझ
दे
कौन
इस
जाहिल
ज़माने
को
फ़रार-ए-क़ैद
लेकर
उड़
गया
ख़ुशियाँ
घराने
की
किया
था
क़ैद
इक
पंछी
कि
घर
का
दिल
लगाने
को
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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है
सहज
स्वीकार
जो
जीवन
पे
वो
अपवाद
तुम
ज़िंदगी
अवसाद
है
अवसाद
में
उन्माद
तुम
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इश्क़
के
बीमार
का
वाजिब
मुक़द्दर
मय-कदा
राह
मुश्किल
है
न
हो
हर
मील
पर
गर
मय-कदा
आदमी
होते
‘तहम्मुल’
रोज़
जाते
काम
पर
गर
गली
ये
छोड़
देते
है
जहाँ
पर
मय-कदा
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वक़्त
का
था
तक़ाज़ा
बदलता
रहा
कोई
बाहों
में
आ
के
फिसलता
रहा
सोचते
थे
परिंदा
वो
महफ़ूज़
है
क़ैद
खाती
रही
वो
मचलता
रहा
एक
पल
में
छुड़ा
हाथ
रुख़्सत
हुआ
मैं
खड़ा
देर
तक
हाथ
मलता
रहा
यूँँ
नहीं
आ
गया
नूर
ये
शाम
का
डूबता
था
कि
सूरज
वो
जलता
रहा
कौन
थे
लोग
जिनको
मिली
मंज़िलें
उम्र
भर
ही
तहम्मुल
टहलता
रहा
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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