k | कभी ये ज़िंदगी अच्छी-भली भी गुज़री थी

  - Dheerendra Singh Faiyaz
कभीयेज़िंदगीअच्छी-भलीभीगुज़रीथी
हमारेहोंटोंसेया'नीहँसीभीगुज़रीथी
अभीसुकूतहैसेहराहैधूलउड़तीहै
इन्हींदोआँखोंसेपहलेनदीभीगुज़रीथी
तमामलफ़्ज़ोंकीसरगोशियाँसुनींशबभर
सदाएँदेतीहुईशा'इरीभीगुज़रीथी
हरएकराहमेंहरलहज़ाढूँढताहूँमैं
यहाँसेइश्क़कीसंकरीगलीभीगुज़रीथी
मुझेहीबातनहींकरनीथीकोईवर्ना
मिरेक़रीबसेकलज़िंदगीभीगुज़रीथी
जहाँपेज़िंदगीबैठीहैपाँवफैलाकर
उसीगलीसेकभीख़ुद-कुशीभीगुज़रीथी
अभीतोसिर्फ़गुज़रतीहैमुझपेतन्हाई
कभीमुझीसेतुम्हारीकमीभीगुज़रीथी
  - Dheerendra Singh Faiyaz
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