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Deepika Jain
jin gharo men mujhe raunakein dikhti theen
jin gharo men mujhe raunakein dikhti theen | जिन घरों में मुझे रौनकें दिखती थीं
- Deepika Jain
जिन
घरों
में
मुझे
रौनकें
दिखती
थीं
घर
वही
दिखते
क्यूँ
आज
वीरान
हैं
- Deepika Jain
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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लोग
हर
मोड़
पे
रुक
रुक
के
सँभलते
क्यूँँ
हैं
इतना
डरते
हैं
तो
फिर
घर
से
निकलते
क्यूँँ
हैं
मोड़
होता
है
जवानी
का
सँभलने
के
लिए
और
सब
लोग
यहीं
आ
के
फिसलते
क्यूँँ
हैं
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Rahat Indori
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इन
का
उठना
नहीं
है
हश्र
से
कम
घर
की
दीवार
बाप
का
साया
Unknown
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ये
परिंदे
भी
खेतों
के
मज़दूर
हैं
लौट
के
अपने
घर
शाम
तक
जाएँगे
Bashir Badr
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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इश्क़
कहता
है
भटकते
रहिए
और
तुम
कहते
हो
घर
जाना
है
Madan Mohan Danish
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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मोहब्बत
पे
लिखी
ग़ज़लें
हज़ारों
पिता
पर
शे'र
क्या
लिखता
है
कोई
Deepika Jain
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साथ
जीने
मरने
के
वादे
किए
थे
हमने
तो
मार
कर
तू
ही
मुझे
फिर
साथ
लेटा
क्यूँँंँ
नहीं
Deepika Jain
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तेरे
हाथों
दफ़न
होकर
सोचती
हूँ
ये
ही
'दीप'
प्यार
के
बदले
ख़ुदा
भी
प्यार
लिखता
क्यूँँंँ
नहीं
Deepika Jain
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दोस्त
आँसू
पोछकर
भी
सच्चा
लगता
क्यूँँंँ
नहीं
कुछ
ग़लत
देखा
तू
ने
तो
मुझ
सेे
पूछा
क्यूँँंँ
नहीं
Deepika Jain
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दिल
पे,
ये
दुनिया
जब
निशान
करे
दर्द
ग़ज़लों
में
तब
बयान
करे
बेच
पाता
मैं
अपने
भी
ग़म
को
गर
ग़मों
की
कोई
दुकान
करे
मतलबी
लोग
सोचते
हैं
यही
सब
उन्हीं
का
महज़
बखान
करे
देखते
रह
गए
अमीर
सभी
कोई
मुफलिस
यहाँँ
पे
दान
करे
मांँ
नहीं
"दीप"
दुनिया
में
तेरे
पास
दूर
तू
कैसे
फिर
थकान
करे
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Deepika Jain
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