qaid-e-gham-e-hayaat se ahl-e-jahaan mafar nahin | क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से अहल-ए-जहाँ मफ़र नहीं

  - Darshan Singh
क़ैद-ए-ग़म-ए-हयातसेअहल-ए-जहाँमफ़रनहीं
ऐसीमिलीहैशाम-ए-ग़मजिसकीकोईसहरनहीं
हैवोसफ़रजोइश्क़कोजानिबदोस्तलेचले
वर्नासफ़रकेवास्तेकौनसीरहगुज़रनहीं
अहल-ए-ख़िरदकोचाहिएदिलकेनगरमेंबसें
दिलसाहसीन-ओ-ख़ुश-नुमाऔरकोईनगरनहीं
तेरेकरमपेहैयक़ींगरचेयेजानताहूँमैं
नालाहैमेराना-रसाआहमेंकुछअसरनहीं
हसरत-ए-इंतिज़ारकीबातहमसेपूछिए
हैयेतवीलदास्ताँक़िस्सा-ए-मुख़्तसरनहीं
लुटतोगएहैंदिलमगरमिलभीगईहैंमंज़िलें
रहगुज़र-ए-हयातमेंइश्क़साराहबरनहीं
अपनारहाहोशजबराज़-ए-हयातपालिया
नेअमत-ए-बे-खु़दीसमझहोशकायेसमरनहीं
इश्क़मता-ए-ला-मकाँइश्क़मता-ए-जावेदाँ
शो'ला-ए-दाएमीहैयेमंज़र-ए-यक-शररनहीं
'दर्शन'-ए-मस्तसेमिलेंखोलेगाराज़-ए-आगही
गरचेवहाँहैजिसजगहअपनीउसेख़बरनहीं
  - Darshan Singh
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