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Shadab Asghar
usko chaaha aur chaahat par qaayam hain
usko chaaha aur chaahat par qaayam hain | उसको चाहा और चाहत पर क़ायम हैं
- Shadab Asghar
उसको
चाहा
और
चाहत
पर
क़ायम
हैं
पर
अफ़सोस
के
हम
इज़हार
नहीं
कर
सकते
- Shadab Asghar
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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आह
को
चाहिए
इक
उम्र
असर
होने
तक
कौन
जीता
है
तिरी
ज़ुल्फ़
के
सर
होने
तक
Mirza Ghalib
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बोसाँ
लबाँ
सीं
देने
कहा
कह
के
फिर
गया
प्याला
भरा
शराब
का
अफ़्सोस
गिर
गया
Abroo Shah Mubarak
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इंसान
अपने
आप
में
मजबूर
है
बहुत
कोई
नहीं
है
बे-वफ़ा
अफ़्सोस
मत
करो
Bashir Badr
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क्या
ग़लत-फ़हमी
में
रह
जाने
का
सदमा
कुछ
नहीं
वो
मुझे
समझा
तो
सकता
था
कि
ऐसा
कुछ
नहीं
इश्क़
से
बच
कर
भी
बंदा
कुछ
नहीं
होता
मगर
ये
भी
सच
है
इश्क़
में
बंदे
का
बचता
कुछ
नहीं
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Tehzeeb Hafi
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बन
कर
कसक
चुभती
रही
दिल
में
मिरे
इक
आह
थी
ऐ
हम–नफ़स
मेरे
मुझे
तुझ
सेे
वफ़ा
की
चाह
थी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वो
सर
भी
काट
देता
तो
होता
न
कुछ
मलाल
अफ़्सोस
ये
है
उस
ने
मेरी
बात
काट
दी
Tahir Faraz
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अफ़सोस
हो
रहा
है
तेरी
शक्ल
देख
कर
क्या
कोई
तेरा
चाहने
वाला
नहीं
रहा
Abbas Tabish
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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ज़ब्त
करता
हूँ
तो
घुटता
है
क़फ़स
में
मिरा
दम
आह
करता
हूँ
तो
सय्याद
ख़फ़ा
होता
है
Qamar Jalalvi
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अक़्लमंदों
के
बस
की
बात
नहीं
इश्क़
अन्धों
का
खेल
है
बेटा
Shadab Asghar
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तू
मेरा
इश्क़-विश्क
था
वरना
हम
तुझे
जीत
लेते
धोखे
से
Shadab Asghar
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करली
दस्तार
ने
कुलाह
से
जंग
हम
ने
कर
ली
है
ख़ैर-ख्वाह
से
जंग
उस
ने
हालात
कर
दिए
ऐसे
अब
तो
लाज़िम
है
बादशाह
से
जंग
हौसला
देखिए
हमारा
आप
कौन
करता
है
उस
निगाह
से
जंग
सिर्फ़
तेरे
ही
ख़्वाब
आएँ
हमें
हम
ने
कर
ली
है
ख़्वाब-गाह
से
जंग
उनकीं
सोचें
उन्हें
मुबारक
हों
हम
नहीं
करते
कम-निगाह
से
जंग
कोई
लश्कर
नहीं
है
साथ
मेरे
और
करनी
है
बादशाह
से
जंग
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Shadab Asghar
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रोज़
दिल
जा
के
तुम
पे
मरता
था
रोज़
इक़
ख़ून
करना
पड़ता
था
रोज़
वो
पढ़ने
आया
करती
थी
उसका
जाना
बड़ा
अखरता
था
उस
की
तस्वीर
देखे
बिन
नासेह
मेरा
दिन
भी
नहीं
गुज़रता
था
रोज़
वो,
फ़ोन
करने
वाली
थी
और
मैं
इंतिज़ार
करता
था
बीच
में
एक
कॉल
आती
थी
और
फिर
उसको
रखना
पड़ता
था
रोज़
इक़
ज़ख़्म
दे
रहा
था
मुझे
और
वो
ग़ैरो
के
घाव
भरता
था
एक
पत्थर
में
जान
बसती
थी
उसको
खोने
से
खूब
डरता
था
आप
अब
हाल
पूछने
आए
मर
गया
वो
जो
तुम
पे
मरता
था
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Shadab Asghar
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मुसलमा
हुँ
सनम
हमको
सहूलत
ये
नहीं
वरना
मैं
तुमको
माँग
लेता
उस
जनम
में
आरज़ू
कर
के
मैं
तुम
से
प्यार
करने
की
निशानी
और
क्या
ही
दूँ
ले
सुन
ले
धड़कने
मेरी
तू
रख
कर
हाथ
छू
कर
के
अरे
अस
गर
उन्हें
तो
चाहिए
था
एक
शहज़ादा
तू
कपड़े
भी
पहनता
है
रफ़ू
पे
फिर
रफ़ू
कर
के
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Shadab Asghar
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