laakh kuchh na ham kahte be-zabaan rahe hote | लाख कुछ न हम कहते बे-ज़बाँ रहे होते

  - Charan Singh Bashar
लाखकुछहमकहतेबे-ज़बाँरहेहोते
आपतोब-हर-सूरतबद-गुमाँरहेहोते
वोतोरंगलेआईअपनेख़ूनकीगर्मी
वर्नासारेक़िस्सेमेंहमकहाँरहेहोते
रातकेभँवरमेंहैंहमचराग़कीसूरत
साथसाथहोतेतोकहकशाँरहेहोते
आजइकहक़ीक़तहैंसर-फ़रोशियाँअपनी
वर्नाहमतबाहीकीदास्ताँरहेहोते
धूपहैमसाइलकीऔरइक'बशर'तन्हा
काशसरपेरिश्तोंकेसाएबाँरहेहोते
  - Charan Singh Bashar
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