hua jo zulm kam-az-kam vo sabt-e-byaaz rahe | हुआ जो ज़ुल्म कम-अज़-कम वो सब्त-ए-ब्याज़ रहे

  - Shiv Sagar
हुआजोज़ुल्मकम-अज़-कमवोसब्त-ए-ब्याज़रहे
किबे-शिकस्तकिसीतौरतोमहाज़रहे
अगरकिसीकेपरस्तिशकीकुछतमन्नाहो
तोसिर्फ़धर्मसेहटकरभीकुछजवाज़रहे
निकलताज़हरभीअमृतकेपहलेमंथनमें
तलाशसचकीहोतोझूठकैसेबाज़रहे
वतनकीगैरत-ओ-तहज़ीबकीहिफ़ाज़तमें
हुएजोक़त्लउनअज्दादोंपरभीनाज़रहे
भलेमिटादोज़मींसेहमारीनस्लोंको
मगरहमारेअसासोंकाकुछलिहाज़रहे
  - Shiv Sagar
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