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Brajnabh Pandey
maine bas ek bosa chaaha tha us se
maine bas ek bosa chaaha tha us se | मैंने बस एक बोसा चाहा था उस से
- Brajnabh Pandey
मैंने
बस
एक
बोसा
चाहा
था
उस
से
वो
शख़्स
आया
मगर
मेरी
क़ज़ा
के
बाद
- Brajnabh Pandey
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न
हो
बरहम
जो
बोसा
बे-इजाज़त
ले
लिया
मैं
ने
चलो
जाने
दो
बेताबी
में
ऐसा
हो
ही
जाता
है
Jalal Lakhnavi
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सुब्ह
सवेरे
नंगे
पाँव
घास
पे
चलना
ऐसा
है
जैसे
बाप
का
पहला
बोसा
क़ुर्बत
जैसे
माँओं
की
Hammad Niyazi
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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बोसा
करने
जब
मैं
आगे
बढ़
जाऊँ
तुम
भी
टेढ़ी
अपनी
गर्दन
कर
लेना
Tanoj Dadhich
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तेरा
रुख़-ए-मुख़त्तत
क़ुरआन
है
हमारा
बोसा
भी
लें
तो
क्या
है
ईमान
है
हमारा
Meer Taqi Meer
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हम
को
गाली
के
लिए
भी
लब
हिला
सकते
नहीं
ग़ैर
को
बोसा
दिया
तो
मुँह
से
दिखला
कर
दिया
Adil Mansuri
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हज़ारों
मन्नतों
पर
भी
कोई
बोसा
नहीं
मिलता
किसी
सूरत
में
उस
कंजूस
के
बटुए
नहीं
खुलते
Kushal Dauneria
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लब-ए-ख़याल
से
उस
लब
का
जो
लिया
बोसा
तो
मुँह
ही
मुँह
में
अजब
तरह
का
मज़ा
आया
Jurat Qalandar Bakhsh
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बोसा
देते
नहीं
और
दिल
पे
है
हर
लहज़ा
निगाह
जी
में
कहते
हैं
कि
मुफ़्त
आए
तो
माल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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बदन
का
सारा
लहू
खिंच
के
आ
गया
रुख़
पर
वो
एक
बोसा
हमें
दे
के
सुर्ख़-रू
है
बहुत
Zafar Iqbal
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बाद
भी
तेरे
फूल
तोड़े
कई
किसी
ख़ुशबू
में
वो
सुकून
नहीं
Brajnabh Pandey
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किया
था
तय
कि
ख़्वाबों
का
शहर
अपना
बनाएँगे
ख़बर
क्या
थी
कि
बस
इक
ख़्वाब
से
ही
टूट
जाएँगे
Brajnabh Pandey
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मुझ
सेे
कहो
कुछ
जाँ
के
इक
अर्सा
हुआ
मुझको
किसी
की
बात
को
माने
हुए
Brajnabh Pandey
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तू
दूर
जा
के
बैठा
है
तो
इक
क़यामत
सी
है
गर
तू
पास
होता
यार
तो
क्या
क़हर
मुझपे
टूटता
Brajnabh Pandey
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कहते
बहुत
थे
दुख
मेरी
क़िस्मत
नहीं
अब
वक़्त
जो
बदला
तो
क्यूँ
हिम्मत
नहीं
अब
रोज़
आते
है
उठा
के
अपना
मुँह
इन
आँसुओं
की
अब
कोइ
क़ीमत
नहीं
और
हमने
दुख
अपना
सुनाया
अपनों
को
पर
अपनों
में
अपनी
कोई
इज़्ज़त
नहीं
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Brajnabh Pandey
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