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Bhaskar Shukla
tujhko dekha tha jab aakhiri baar to
tujhko dekha tha jab aakhiri baar to | तुझको देखा था जब आख़िरी बार तो
- Bhaskar Shukla
तुझको
देखा
था
जब
आख़िरी
बार
तो
क्या
पता
था
कि
ये
आख़िरी
बार
है
- Bhaskar Shukla
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ज़मीन-ओ-आसमाँ
को
जगमगा
दो
रौशनी
से
दिसम्बर
आज
मिलने
जा
रहा
है
जनवरी
से
Bhaskar Shukla
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कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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दिन
गुज़रते
हैं
अब
किताबों
में
और
रातें
तुम्हारे
ख़्वाबों
में
जानता
हूँ
उसे
मैं
आहट
से
छुप
नहीं
पायेगा
हिजाबों
में
यार
जैसी
है
रंगत-ओ-ख़ुशबू
नाज़ुकी
कम
है
इन
गुलाबों
में
हम
भी
छानेंगे
ख़ाक
सेहरा
की
वो
नज़र
आ
गया
सराबों
में
वो
किसी
को
बुरा
नहीं
कहते
एक
अच्छाई
है
ख़राबों
में
कोई
ग़म
हो
तो
मीर
पढ़ते
हैं
हम
नहीं
डूबते
शराबों
में
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तुम्हारी
याद
का
रंग
डाल
कर
के
कहा
तन्हाई
ने
होली
मुबारक
!
Bhaskar Shukla
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एक
ख़्वाहिश
मेरी
ये
भी
थी
कि
दुनिया
देखूँ
तू
मगर
साथ
नहीं
है
तो
भला
क्या
देखूँ
तेरा
लिक्खा
जो
पढ़ूँ
तो
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तो
तेरा
चेहरा
देखूँ
रात
छत
पर
मैं
सितारों
से
गढ़ूँ
इक
पैकर
फिर
वही
नक़्श
खलाओं
में
उभरता
देखूँ
ठीक
थी
उन
सेे
मुलाक़ात
मगर
ठीक
ही
थी
फ़िल्म
इतनी
नहीं
अच्छी
कि
दोबारा
देखूँ
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Bhaskar Shukla
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