din guzarte hain ab kitaabon men | दिन गुज़रते हैं अब किताबों में

  - Bhaskar Shukla
दिनगुज़रतेहैंअबकिताबोंमें
औररातेंतुम्हारेख़्वाबोंमें
जानताहूँउसेमैंआहटसे
छुपनहींपायेगाहिजाबोंमें
यारजैसीहैरंगत-ओ-ख़ुशबू
नाज़ुकीकमहैइनगुलाबोंमें
हमभीछानेंगेख़ाकसेहराकी
वोनज़रगयासराबोंमें
वोकिसीकोबुरानहींकहते
एकअच्छाईहैख़राबोंमें
कोईग़महोतोमीरपढ़तेहैं
हमनहींडूबतेशराबोंमें
  - Bhaskar Shukla
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