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Bakul Dev
jaan le le na zabt-e-aah kahii
jaan le le na zabt-e-aah kahii | जान ले ले न ज़ब्त-ए-आह कहीं
- Bakul Dev
जान
ले
ले
न
ज़ब्त-ए-आह
कहीं
रो
लिया
कीजे
गाह
गाह
कहीं
इब्तिदाई
जो
एक
ख़दशा
था
खुल
न
जाए
उसी
पे
राह
कहीं
होने
वाली
है
ये
फ़ज़ा
रंगीन
अब्र
होने
लगे
सियाह
कहीं
ये
सुहुलत
है
ज़िंदगी
को
बहुत
रब्त
होता
रहे
निबाह
कहीं
और
कुछ
देर
ग़म
नज़र
में
रख
क्या
ख़बर
मिल
ही
जाए
थाह
कहीं
हैफ़
सर
से
गुज़र
गया
पानी
धोने
आए
थे
हम
गुनाह
कहीं
- Bakul Dev
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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हाए
उसके
हाथ
पीले
होने
का
ग़म
इतना
रोए
हैं
कि
आँखें
लाल
कर
ली
Harsh saxena
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कभी
ज़िन्दगी
से
यूँँ
न
चुराया
करो
नज़र
कि
मौजूद
भी
रहो
तो
न
आया
करो
नज़र
S M Afzal Imam
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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बूढ़ी
बोझल
सूखी
आँखें
देख
रही
हैं
हैरत
से
कच्ची
उम्र
के
लड़कों
ने
कुछ
ऐसी
बातें
लिक्खी
हैं
Shadab Javed
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एक
ही
बार
नज़र
पड़ती
है
उन
पर
‘ताबिश’
और
फिर
वो
ही
लगातार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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हमारे
सीने
पे
उँगलियों
से
तुम
अपना
चेहरा
बना
रहे
थे
तुम्हें
कुछ
उस
की
ख़बर
नहीं
थी
हमारे
दिल
में
जो
चल
रहा
था
Nadim Nadeem
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हुए
हम
बे-सर-ओ-सामान
लेकिन
सफ़र
को
कर
लिया
आसान
लेकिन
किनारे
ज़द
में
आना
चाहते
हैं
उतरने
को
है
अब
तूफ़ान
लेकिन
बहुत
जी
चाहता
है
खुल
के
रो
लें
लहक
उट्ठे
न
ग़म
का
धान
लेकिन
तअ'ल्लुक़
तर्क
तो
कर
लें
सभी
से
भले
लगते
हैं
कुछ
नुक़सान
लेकिन
तवाज़ुन
आ
चला
है
ज़ेहन-ओ-दिल
में
शिकस्ता
हाल
है
मीज़ान
लेकिन
बहुत
से
रंग
उतरे
बारिशों
में
धनक
के
खुल
गए
इम्कान
लेकिन
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बार-ए-दीगर
ये
फ़लसफ़े
देखूँ
ज़ख़्म
फिर
से
हरे-भरे
देखूँ
ये
बसीरत
अजब
बसीरत
है
आइनों
में
भी
आइने
देखूँ
ज़ावियों
से
अगर
नजात
मिले
सारे
मंज़र
घुले-मिले
देखूँ
नज़्म
करना
है
बे-हिसाबी
को
लफ़्ज़
सारे
नपे-तुले
देखूँ
आख़िर
आख़िर
जो
दास्ताँ
न
बने
अव्वल
अव्वल
वो
वाक़िए
देखूँ
दूरियाँ
धुँद
बन
के
बिखरी
हैं
कुछ
क़रीब
आ
कि
फ़ासले
देखूँ
एक
नश्शा
है
ख़ुद-नुमाई
भी
जो
ये
उतरे
तो
फिर
तुझे
देखूँ
ले
गया
वो
बची-खुची
नींदें
ख़्वाब
कैसे
रहे-सहे
देखूँ
रात
फैली
हुई
है
मीलों
तक
क्या
चराग़ों
के
दाएरे
देखूँ
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चाल
अपनी
अदास
चलते
हैं
हम
कहाँ
कज-रवी
से
टलते
हैं
ज़िंदगी
बे-रुख़ी
से
पेश
न
आ
तुझ
पे
एहसाँ
मिरे
निकलते
हैं
कारदाँ
हैं
बला
के
सब
चेहरे
आइने
को
हुनर
से
छलते
हैं
कोई
आतिश-फ़िशाँ
है
सीने
में
अश्क
मिस्ल-ए-शरर
निकलते
हैं
उस
के
तर्ज़-ए-सुख़न
के
मारे
लोग
अपना
लहजा
कहाँ
बदलते
हैं
आज
सो
लूँ
कि
है
सुहुलत-ए-शब
दिन
कहाँ
रोज़
रोज़
ढलते
हैं
आ
गई
लौ
ख़िज़ाँ
की
पर्बत
तक
वादियों
में
चिनार
जलते
हैं
पंजा-ए-ज़ेहन
के
तले
पैहम
ताइर-ए-दिल
कई
मचलते
हैं
ख़्वाब
का
जिन
न
आएगा
बाहर
बे-सबब
आप
आँख
मलते
हैं
तुझ
से
किरदार
हों
'बकुल'
जिन
में
ऐसे
क़िस्से
कहाँ
सँभलते
हैं
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जो
है
चश्मा
उसे
सराब
करो
शहर-ए-तिश्ना
में
इंक़लाब
करो
मुस्कुराने
का
फ़न
तो
बअ'द
का
है
पहले
साअ'त
का
इंतिख़ाब
करो
अब
के
ता'बीर
मसअला
न
रहे
ये
जो
दुनिया
है
इस
को
ख़्वाब
करो
और
पकने
दो
इश्क़
की
मिट्टी
पार
उजलत
में
मत
चनाब
करो
अहद-ए-नौ
के
अजब
तक़ाज़े
हैं
जो
है
ख़ुशबू
उसे
गुलाब
करो
यूँँ
ख़ुशी
की
हवस
न
जाएगी
एक
इक
ग़म
को
बे-नक़ाब
करो
हरसिंगारों
से
बोलती
है
ज़मीं
अब
की
रुत
में
मुझे
किताब
करो
पहले
पूछो
सवाल
अपने
तईं
फिर
ख़ला
से
तलब
जवाब
करो
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यकायक
अक्स
धुँदलाने
लगे
हैं
नज़र
में
आइने
आने
लगे
हैं
ज़मीं
है
मुंतज़िर
फ़स्ल-ए-ज़िया
की
फ़लक
पर
नूर
के
दाने
लगे
हैं
ख़िज़ाँ
आने
से
पहले
बाँच
लेना
दरख़्तों
पर
जो
अफ़्साने
लगे
हैं
हमें
इस
तरह
ही
होना
था
आबाद
हमारे
साथ
वीराने
लगे
हैं
फ़सील-ए-दिल
गिरा
तो
दूँ
मैं
लेकिन
इसी
दीवार
से
शाने
लगे
हैं
कभी
फ़ाक़ा-कशी
दिखलाएगी
रंग
इसी
में
सोलहों
आने
लगे
हैं
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