yaa KHaak ka bistar hai gale men kafni hai | याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

  - Bahadur Shah Zafar
याँख़ाककाबिस्तरहैगलेमेंकफ़नीहै
वाँहाथमेंआईनाहैगुलपैरहनीहै
हाथोंसेहमेंइश्क़केदिनरातनहींचैन
फ़रियादफ़ुग़ाँदिनकोहैशबनारा-ज़नीहै
हुश्यारहोग़फ़लतसेतूग़ाफ़िलहोदिल
अपनीतोनज़रमेंयेजगहबे-वतनीहै
कुछकहनहींसकताहूँज़बाँसेकिज़रादेख
क्याजाएहैजिसजाएकुछदम-ज़दनीहै
मिज़्गाँपेमिरेलख़्त-ए-जिगरहीनहींयारो
इसतारसेवोरिश्ताअक़ीक़-ए-यमनीहै
लिखऔरग़ज़लक़ाफ़िएकोफेर'ज़फ़र'तू
अबतब्अ'कीदरियाकीतिरीमौज-ज़नीहै
  - Bahadur Shah Zafar
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