zulf jo rukh par tire ai mehr-e-tal'at khul gaii | ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई

  - Bahadur Shah Zafar
ज़ुल्फ़जोरुख़परतिरेमेहर-ए-तलअतखुलगई
हमकोअपनीतीरा-रोज़ीकीहक़ीक़तखुलगई
क्यातमाशाहैरग-ए-लैलामेंडूबानेश्तर
फ़स्द-ए-मजनूँबाइस-ए-जोश-ए-मोहब्बतखुलगई
दिलकासौदाइकनिगहपरहैतिरीठहराहुआ
नर्ख़तूक्यापूछताहैअबतोक़ीमतखुलगई
आईनेकोनाज़थाक्याअपनेरू-ए-साफ़पर
आँखहीपरदेखतेहीतेरीसूरतखुलगई
थीअसीरान-ए-क़फ़सकोआरज़ूपरवाज़की
खुलगईखिड़कीक़फ़सकीक्याकिक़िस्मतखुलगई
तेरेआरिज़परहुआआख़िरग़ुबार-ए-ख़तनुमूद
खुलगईआईना-रूदिलकीकुदूरतखुलगई
बे-तकल्लुफ़आएतुमखोलेहुएबंद-ए-क़बा
अबगिरहदिलकीहमारेफ़िल-हक़ीक़तखुलगई
बाँधीज़ाहिदनेतवक्कुलपरकमरसौबारचुस्त
लेकिनआख़िरबाइस-ए-सुस्ती-ए-हिम्मतखुलगई
खुलतेखुलतेरुकगएवोउनकोतूने'ज़फ़र'
सचकहोकिसआँखसेदेखाकिचाहतखुलगई
  - Bahadur Shah Zafar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy