k | कभी दीवार लरज़ती है तो दर चीख़ता है

  - Badr-e-Alam Khan Azmi
कभीदीवारलरज़तीहैतोदरचीख़ताहै
जानेक्याबातहैदिन-रातयेघरचीख़ताहै
सारेमाहौलपेतारीहैकसाफ़तऐसी
साँसलेतेहुएघबराकेशजरचीख़ताहै
ख़ामुशीहौसलाज़ालिमकाबढ़ादेतीहै
औरख़ता-कारहैमज़लूमअगरचीख़ताहै
रूहमेंडंकचुभोतीहैसितम-पेशाहयात
एकख़ामोशफ़ुग़ाँहैकिबशरचीख़ताहै
कितनाबे-ख़ौफ़थावोग़ारकीतारीकीमें
आजहाथोंमेंलिएशम्स-ओ-क़मरचीख़ताहै
कभीतारीख़उछलतीहैकटेहाथकेसाथ
कभीनेज़ेपेउछालाहुआसरचीख़ताहै
पेशकरताहैछुपाकरग़म-ए-पिन्हाँलेकिन
उसकीतहरीरकाहरज़ेर-ओ-ज़बरचीख़ताहै
सख़्तबीमारसही'ताज'अभीज़िंदाहै
इकमुसव्विरकामगरख़ून-ए-जिगरचीख़ताहै
  - Badr-e-Alam Khan Azmi
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