ye mat kaho ki bheed men tanhaa khada hooñ main | ये मत कहो कि भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ मैं

  - Azm Shakri
येमतकहोकिभीड़मेंतन्हाखड़ाहूँमैं
टकराकेआबगीनेसेपत्थरहुआहूँमैं
आँखोंकेजंगलोंमेंमुझेमतकरोतलाश
दामनपेआँसुओंकीतरहगयाहूँमैं
यूँँबे-रुख़ीकेसाथमुँहफेरकेगुज़र
साहब-ए-जमालतिराआइनाहूँमैं
यूँँबारबारमुझकोसदाएँदीजिए
अबवोनहींरहाहूँकोईदूसराहूँमैं
मेरीबुराइयोंपेकिसीकीनज़रनहीं
सबयेसमझरहेहैंबड़ापारसाहूँमैं
वोबे-वफ़ासमझताहैमुझकोउसेकहो
आँखोंमेंउसकेख़्वाबलिएफिररहाहूँमैं
  - Azm Shakri
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