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Azm Shakri
main ne ik shahar hamesha ke li.e chhod diya
main ne ik shahar hamesha ke li.e chhod diya | मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया
- Azm Shakri
मैं
ने
इक
शहर
हमेशा
के
लिए
छोड़
दिया
लेकिन
उस
शहर
को
आँखों
में
बसा
लाया
हूँ
- Azm Shakri
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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इस
शहर
में
जीने
के
अंदाज़
निराले
हैं
होंटों
पे
लतीफ़े
हैं
आवाज़
में
छाले
हैं
Javed Akhtar
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अमीर-ए-शहर
का
रिश्ते
में
कोई
कुछ
नहीं
लगता
ग़रीबी
चाँद
को
भी
अपना
मामा
मान
लेती
है
Munawwar Rana
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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हाथ
ख़ाली
है
तेरे
शहरस
जाते
जाते
जान
होती
तो
मेरी
जान
लुटाते
जाते
Rahat Indori
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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अब
तो
हर
हाथ
का
पत्थर
हमें
पहचानता
है
उम्र
गुज़री
है
तेरे
शहर
में
आते
जाते
Rahat Indori
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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उसकी
बस्ती
से
पहले
कब्रिस्तान
आशिकों
के
लिए
इशारा
था
Unknown
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उनको
बचाये
रक्खो
मैं
चाहता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाये
रक्खो
Azm Shakri
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ज़िंदगी
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
के
ज़ख़्मों
के
निशाँ
में
फिर
वहीं
पर
चोट
मारी
जा
रही
है
वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
बोल
कर
ता'रीफ़
में
कुछ
लफ़्ज़
उस
की
शख़्सियत
अपनी
निखारी
जा
रही
है
धूप
के
दस्ताने
हाथों
में
पहन
कर
बर्फ़
की
चादर
उतारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उन
को
बचाए
रक्खो
मैं
जानता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाए
रक्खो
ज़रूर
उतरेगा
आसमाँ
से
कोई
सितारा
ज़मीन
वालो
ज़मीं
पे
पलकें
बिछाए
रक्खो
अभी
वहीं
से
किसी
के
ग़म
की
सदा
उठेगी
उसी
दरीचे
पे
कान
अपने
लगाए
रखो
हमेशा
ख़ुद
से
भी
पुर-तकल्लुफ़
रहो
तो
अच्छा
ख़ुद
अपने
अंदर
भी
एक
दीवार
उठाए
रक्खो
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Azm Shakri
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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सारी
रात
के
बिखरे
हुए
शीराज़े
पर
रक्खी
हैं
प्यार
की
झूटी
उम्मीदें
ख़ामियाज़े
पर
रक्खी
हैं
कोई
तो
अपना
वा'दा
ही
आसानी
से
भूल
गया
और
किसी
की
दो
आँखें
दरवाज़े
पर
रक्खी
हैं
उस
के
ख़्वाब
हक़ीक़त
हैं
उस
की
ज़ात
मुकम्मल
है
और
हमारी
सब
ख़ुशियाँ
अंदाज़े
पर
रक्खी
हैं
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Azm Shakri
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