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Azm Shakri
laakhon sad
laakhon sad | लाखों सद
- Azm Shakri
लाखों
सद
में
ढेरों
ग़म,
फिर
भी
नहीं
हैं
आँखें
नम
इक
मुद्दत
से
रोए
नहीं,
क्या
पत्थर
के
हो
गए
हम
यूँँं
पलकों
पे
हैं
आँसू,
जैसे
फूलों
पर
शबनम
ख़्वाब
में
वो
आ
जाते
हैं,
इतना
तो
रखते
हैं
भरम
हम
उस
बस्ती
में
हैं
जहाँ,
धूप
ज़ियादा
साए
कम
अब
ज़ख़्मों
में
ताब
नहीं,
अब
क्यूँ
लाए
हो
मरहम
- Azm Shakri
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नक़्शा
उठा
के
और
कोई
शहर
देखिए
इस
शहर
में
तो
सब
से
मुलाक़ात
हो
गई
Nida Fazli
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नहीं
हो
तुम
तो
ऐसा
लग
रहा
है
कि
जैसे
शहर
में
कर्फ़्यूँँ
लगा
है
Fahmi Badayuni
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तुम्हारे
शहर
में
तोहमत
है
ज़िंदा
रहना
भी
जिन्हें
अज़ीज़
थीं
जानें
वो
मरते
जाते
हैं
Abbas Tabish
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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हमने
पर्चे
आँसुओं
से
भर
दिए
और
तुमने
इतने
कम
नंबर
दिए
ऊंचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
जलजले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
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Zubair Ali Tabish
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जि
यूँँगी
किस
तरह
तेरे
बिना
मत
फिक्र
कर
इसकी
गुज़रती
जिस
शहरस
हूँ
दिवाने
छोड़
आती
हूँ
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Parul Singh "Noor"
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अजीब
हालत
है
जिस्म-ओ-जाँ
की
हज़ार
पहलू
बदल
रहा
हूँ
वो
मेरे
अंदर
उतर
गया
है
मैं
ख़ुद
से
बाहर
निकल
रहा
हूँ
Azm Shakri
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ज़ख़्म
जो
तुम
ने
दिया
वो
इस
लिए
रक्खा
हरा
ज़िंदगी
में
क्या
बचेगा
ज़ख़्म
भर
जाने
के
बाद
Azm Shakri
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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दिल
में
हसरत
कोई
बची
ही
नहीं
आग
ऐसी
लगी
बुझी
ही
नहीं
उस
ने
जब
ख़ुद
को
बे-नक़ाब
किया
फिर
किसी
की
नज़र
उठी
ही
नहीं
जैसा
इस
बार
खुल
के
रोए
हम
ऐसी
बारिश
कभी
हुई
ही
नहीं
ज़िंदगी
को
गले
लगाते
क्या
ज़िंदगी
उम्र-भर
मिली
ही
नहीं
मुंतज़िर
कब
से
चाँद
छत
पर
है
कोई
खिड़की
अभी
खुली
ही
नहीं
मैं
जिसे
अपनी
ज़िंदगी
समझा
सच
तो
ये
है
वो
मेरी
थी
ही
नहीं
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Azm Shakri
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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