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Avtar Singh Jasser
is tarah tujh se kinaara kar liya main ne
is tarah tujh se kinaara kar liya main ne | इस तरह तुझ से किनारा कर लिया मैं ने
- Avtar Singh Jasser
इस
तरह
तुझ
से
किनारा
कर
लिया
मैं
ने
और
किसी
से
इश्क़
यारा
कर
कर
लिया
मैं
ने
है
सज़ा
जिसकी
अभी
तक
मिल
रही
मुझको
जुर्म
देखो
वो
दोबारा
कर
लिया
मैं
ने
- Avtar Singh Jasser
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इश्क़
तू
ने
बड़ा
नुक़सान
किया
है
मेरा
मैं
तो
उस
शख़्स
से
नफ़रत
भी
नहीं
कर
सकता
Liaqat Jafri
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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अगर
तुम
हो
तो
घबराने
की
कोई
बात
थोड़ी
है
ज़रा
सी
बूँदा-बाँदी
है
बहुत
बरसात
थोड़ी
है
ये
राह-ए-इश्क़
है
इस
में
क़दम
ऐसे
ही
उठते
हैं
मोहब्बत
सोचने
वालों
के
बस
की
बात
थोड़ी
है
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Abrar Kashif
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कब
तुम्हें
इश्क़
पे
मजबूर
किया
है
हमने
हम
तो
बस
याद
दिलाते
हैं
चले
जाते
हैं
Abbas Tabish
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मुझ
में
है
क्या
कमी
ये
बतला
दो
कैसों
कैसों
को
मिल
गया
है
इश्क़
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Shadab Asghar
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इश्क़
करना
इक
सज़ा
है
क्या
करें
इश्क़
का
अपना
मज़ा
है
क्या
करें
Syed Naved Imam
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इश्क़
भी
अपनी
ही
शर्तों
पे
किया
है
मैं
ने
ख़ुद
को
बेचा
नहीं
बाज़ार
में
सस्ता
करके
उस
से
कहना
था
के
वो
कितना
ज़रूरी
है
मुझे
आ
रहा
हूँ
अभी
जिस
शख़्स
से
झगड़ा
करके
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Khan Janbaz
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वफ़ा
का
ज़ोर
अगर
बाज़ुओं
में
आ
जाए
चराग़
उड़ता
हुआ
जुगनुओं
में
आ
जाए
खिराजे
इश्क़,
कहीं
जा
के
तब
अदा
होगा
हमारा
ख़ून
अगर
आँसुओं
में
आ
जाए
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Hashim Raza Jalalpuri
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इश्क़
में
जी
को
सब्र
ओ
ताब
कहाँ
उस
से
आँखें
लड़ीं
तो
ख़्वाब
कहाँ
Meer Taqi Meer
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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जीने
के
और
भी
जहाँ
में
बंद-ओ-बस्त
थे
यह
और
बात
थी
कि
हम
बादा'परस्त
थे
तू
आ
चुका
था
फिर
भी
तेरा
इंतज़ार
था
हम
याद
में
'जस्सर'
तेरी
इस
दरजा
मस्त
थे
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Avtar Singh Jasser
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फिर
मिलेंगे
आप
से
गर
ज़िंदगी
बाक़ी
रही
बात
यह
उस
ने
जुदा
होते
हुए
मुझ
से
कही
Avtar Singh Jasser
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कुछ
पौधे
ज़्यादा
पानी
में
कुछ
कम
में
मर
जाते
हैं
और
जो
बच
जाएँ
पत्तझर
के
मौसम
में
मर
जाते
हैं
दुनिया
के
आगे
हम
ज़िन्दा
होते
हैं
बस
बाहरस
लेकिन
अपने
अंदर
अक्सर
हम
हम
में
मर
जाते
हैं
हम
तो
ख़ुद
को
खो
के
भी
ज़िन्दा
हैं
"जस्सर"
आज
तलक
वर्ना
लोग
किसी
को
खोने
के
ग़म
में
मर
जाते
हैं
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Avtar Singh Jasser
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आशना
भी
नहीं
और
अदू
भी
नहीं
दर्द-ए-फ़ुर्क़त
नहीं
और
तू
भी
नहीं
बिन
पिए
एक
दिन
भी
न
मैं
रह
सकूँ
मयकशी
की
मुझे
ऐसी
ख़ू
भी
नहीं
वो
जो
हर
एक
ज़र्रे
में
मौजूद
है
मुझ
को
आया
नज़र
एक
सू
भी
नहीं
इत्र
जिस
फूल
ने
की
जवानी
मेरी
याद
मुझ
को
रही
उसकी
बू
भी
नहीं
ग़ालिब-ओ-मीर
जस्सर
ख़ुदा-ए-सुख़न
एक
से
हैं
मगर
हू-ब-हू
भी
नहीं
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Avtar Singh Jasser
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कमी
बस
आपकी
जस्सर
मुसलसल
खल
रही
है
वगरना
ज़िन्दगी
तो
अच्छी
ख़ासी
चल
रही
है
Avtar Singh Jasser
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