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Abdulla Asif
saath men jab kabhi khwaab men aayenge
saath men jab kabhi khwaab men aayenge | साथ में जब कभी ख़्वाब में आएँगे
- Abdulla Asif
साथ
में
जब
कभी
ख़्वाब
में
आएँगे
सुब्ह
होती
है
क्या
भूल
ही
जाएँगे
- Abdulla Asif
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आसमाँ
इतनी
बुलंदी
पे
जो
इतराता
है
भूल
जाता
है
ज़मीं
से
ही
नज़र
आता
है
Waseem Barelvi
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दो
-चार
दिन
में
भूल
जायेगें
मिरे
अपने
मुझे
मैं
कोइ
होली,
दशहरा
हूँ
जो
मनाया
जाऊँगा
karan singh rajput
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मुझ
सेे
वा'दा
करने
वाले
वा'दा
करके
भूल
गए
अच्छा
ख़ासा
पीतल
था
मैं
सोना
करके
भूल
गए
Tanoj Dadhich
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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परिंद
शाख़
पे
तन्हा
उदास
बैठा
है
उड़ान
भूल
गया
मुद्दतों
की
बंदिश
में
Khaleel Tanveer
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हम
वो
हैं
जो
ख़ुदा
को
भूल
गए
तुम
मेरी
जान
किस
गुमान
में
हो
Jaun Elia
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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जो
अंजान
थे
वो
मेरे
यार
निकले
मगर
जो
भी
अपने
थे
बेकार
निकले
ज़मीं
खा
गई
उन
वफ़ाओं
को
आख़िर
सितम
ये
हुआ
हम
गुनहगार
निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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हम
ही
हैं
कश्तियाँ
काग़ज़
से
बनाने
वाले
हम
ही
हैं
दरिया
को
औक़ात
दिखाने
वाले
हो
कहीं
के
नहीं
तुम
भी
हो
यहीं
के
यानी
यानी
तुम
भी
हो
फ़क़त
ख़ाक़
उड़ाने
वाले
दुनिया
वालों
को
मैं
बेकार
समझता
हूँ
और
मुझको
बेकार
समझते
हैं
ज़माने
वाले
हम
तो
सुनते
हैं
निखरता
है
हुनर
ऐसों
से
हमें
भी
चाहिए
कुछ
ऐब
गिनाने
वाले
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Abdulla Asif
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रो
रो
के
कह
रही
है
धनक
धिन
धनक
धनक
इक
साज़
तेरे
लम्स
से
जो
आश्ना
नहीं
Abdulla Asif
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फ़िरदौस
मसअला
है
नहीं
तो
ये
आदमी
वो
पाप
करते
जिनका
तसव्वुर
हराम
है
Abdulla Asif
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है
बाइस-ए-कुल्फ़त
यूँँ
कमाल
अपना
दिखाना
बे
चश्म-ए-बसीरत
है
तमाशाई
हमारा
Abdulla Asif
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है
मिरी
ज़िन्दगी
में
सिफर
का
बड़ा
फ़ाइदा
कोई
आए
या
जाए
मैं
तो
उतना
ही
रहता
हूँ
Abdulla Asif
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