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A R Sahil "Aleeg"
samajhna gar kalaam-e-allah ke quraan ko hai
samajhna gar kalaam-e-allah ke quraan ko hai | समझना गर कलाम-ए-अल्लाह के क़ुरआन को है
- A R Sahil "Aleeg"
समझना
गर
कलाम-ए-अल्लाह
के
क़ुरआन
को
है
पढ़ो,
सीखो
व
जानो
अरबी-ज़बाँ
पहले-पहल
तुम
- A R Sahil "Aleeg"
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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अल्लाह
अल्लाह
हुस्न
की
ये
पर्दा-दारी
देखिए
भेद
जिस
ने
खोलना
चाहा
वो
दीवाना
हुआ
Arzoo Lakhnavi
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मज़हब
से
मेरे
क्या
तुझे
मेरा
दयार
और
मैं
और
यार
और
मिरा
कारोबार
और
Meer Taqi Meer
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पहले
पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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रंग
और
नस्ल
ज़ात
और
मज़हब
जो
भी
है
आदमी
से
कमतर
है
इस
हक़ीक़त
को
तुम
भी
मेरी
तरह
मान
जाओ
तो
कोई
बात
बने
Sahir Ludhianvi
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ये
मय-कदा
है
यहाँ
हैं
गुनाह
जाम-ब-दस्त
वो
मदरसा
है
वो
मस्जिद
वहाँ
मिलेगा
सवाब
Ali Sardar Jafri
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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घी
मिस्री
भी
भेज
कभी
अख़बारों
में
कई
दिनों
से
चाय
है
कड़वी
या
अल्लाह
Nida Fazli
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मज़हब
नहीं
सिखाता
आपस
में
बैर
रखना
हिन्दी
हैं
हम
वतन
है
हिन्दोस्ताँ
हमारा
Allama Iqbal
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तेरा
रुख़-ए-मुख़त्तत
क़ुरआन
है
हमारा
बोसा
भी
लें
तो
क्या
है
ईमान
है
हमारा
Meer Taqi Meer
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नीम
कड़वी
ज़बाँ
है
मेरी
चाय
मिठी
पीला
रहे
हो
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
की
डिश
ही
है
कुछ
ऐसी
सब
खा
कर
बीमार
हुए
हैं
A R Sahil "Aleeg"
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चार
पैसे
भी
हैं
ज़रूरी
दोस्त
शोहरतों
से
तो
घर
नहीं
चलता
A R Sahil "Aleeg"
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मोहब्बत
के
इस
सफ़र
में
ज़माने
से
इक
यही
सिलसिला
चलता
आ
रहा
है
यहाँ
कोई
लूट
जाता
है,
कोई
लुट
तो
कोई
लौट
जाता
है
बीच
रस्ते
A R Sahil "Aleeg"
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ज़ख़्म
मिलते
है
इश्क़
में
जो
भी
सूख
कर
भी
सुखा
नहीं
करते
A R Sahil "Aleeg"
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