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A R Sahil "Aleeg"
apni ar
apni ar | अपनी अर्थी उठा रहे हैं ख़ुद
- A R Sahil "Aleeg"
अपनी
अर्थी
उठा
रहे
हैं
ख़ुद
लोग
कहते
हैं
इसलिए
स्वार्थी
- A R Sahil "Aleeg"
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मत
सहल
हमें
जानो
फिरता
है
फ़लक
बरसों
तब
ख़ाक
के
पर्दे
से
इंसान
निकलते
हैं
Meer Taqi Meer
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ज़िक्र
तबस्सुम
का
आते
ही
लगते
हैं
इतराने
लोग
और
ज़रा
सी
ठेस
लगी
तो
जा
पहुँचे
मयख़ाने
लोग
Ateeq Allahabadi
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रो
रहा
है
बशर
मगर
देखो
ज़िन्दगी
को
रफ़ू
नहीं
करता
Tarun Pandey
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तलब
करें
तो
ये
आँखें
भी
इन
को
दे
दूँ
मैं
मगर
ये
लोग
इन
आँखों
के
ख़्वाब
माँगते
हैं
Abbas rizvi
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क्या
लोग
हैं
कि
दिल
की
गिरह
खोलते
नहीं
आँखों
से
देखते
हैं
मगर
बोलते
नहीं
Akhtar Hoshiyarpuri
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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जिस
ने
इस
दौर
के
इंसान
किए
हैं
पैदा
वही
मेरा
भी
ख़ुदा
हो
मुझे
मंज़ूर
नहीं
Hafeez Jalandhari
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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लगा
हूँ
कहने
जब
से
बे-वफ़ा
तुझको
मैं
ख़ुद
भी
ताजिरान-ए-इश्क़
बन
बैठा
A R Sahil "Aleeg"
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लोग
कहते
हैं
वफ़ा
की
होती
है
मूरत
ये
लड़की
सच
है
लेकिन
लड़कियाँ
वो
हुस्न
से
होती
हैं
पैदल
A R Sahil "Aleeg"
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सच
है
शाइर
को
मिला
करती
है
शोहरत
की
बुलंदी
हाँ
मगर
जलता
नहीं
शोहरत
से
घर
का
कोई
चूल्हा
A R Sahil "Aleeg"
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शोर
है
सारे
मह-जबीनों
में
इक
नगीना
है
सौ
नगीनों
में
वो
शराफ़त
का
एक
पुतला
है
हाँ
मगर
साथ
के
कमीनों
में
सब
ने
मतलब
की
खींच
कर
सरहद
बाँट
दी
है
ज़मीं
ज़मीनों
में
मोड़
कर
मुँह
गया
जो
ये
दरिया
आग
दे
दी
गई
सफ़ीनों
में
अब
दिमाग़ों
में
ऐसे
है
नफ़रत
गोलियाँ
जैसे
मैगज़ीनों
में
मुझ
को
ख़तरा
तो
पैरहन
से
है
साँप
बैठे
है
आस्तीनों
में
हम
को
बस
शा'इरी
से
है
मतलब
आप
रहिएगा
नामचीनों
में
देखिए
दिल
दिमाग़
और
ये
इश्क़
जंग
जारी
है
कब
से
तीनों
में
खोटे
सिक्के
हैं
हम
बता
साहिल
कौन
रक्खेगा
अब
ख़ज़ीनों
में
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A R Sahil "Aleeg"
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तशक्कुर
हूँ
मैं
तेरा,
गर
नहीं
करती
बे-वफ़ाई
कहाँ
बनता
फिर
ये
साहिल
जहाँ
में
ए
आर
साहिल
A R Sahil "Aleeg"
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