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anupam shah
vo jab bhi milne aati hai to saamaan chhod jaati hai
vo jab bhi milne aati hai to saamaan chhod jaati hai | वो जब भी मिलने आती है, तो सामां छोड़ जाती है
- anupam shah
वो
जब
भी
मिलने
आती
है,
तो
सामां
छोड़
जाती
है
मेरी
गर्दन
पे,
अपने
लब,
मिरी
जाँ
छोड़
जाती
है
- anupam shah
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कहाँ
तक
साथ
दोगी
तुम
हमारा
सनम
जावेदाँ
है
यह
ग़म
हमारा
Avtar Singh Jasser
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सुन
ओ
कहानीकार
कोई
ऐसा
रोल
दे
ऐसे
अदा
करूँं
मेरी
इज़्ज़त
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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अब
कारगह-ए-दहर
में
लगता
है
बहुत
दिल
ऐ
दोस्त
कहीं
ये
भी
तिरा
ग़म
तो
नहीं
है
Majrooh Sultanpuri
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बेनतीजा
रह
गईं
दिल्ली
में
सारी
बैठकें
अन्नदाता
खेत
की
मेड़ों
पे
भूखे
मर
गए
Siraj Faisal Khan
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दो
नन्हीं
कलियों
ने
रोक
लिया
वरना
तितली
ने
तो
आज
धतूरा
खाना
था
Shruti chhaya
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तेरी
तारीफ़
करने
लग
गए
हैं
तेरे
दुश्मन
हमारे
शे'र
सुनके
Tanoj Dadhich
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जबकि
मैंने
इश्क़
में
मरने
का
वा'दा
कर
लिया
तब
लगा
मुझको
कि
मैंने
इश्क़
ज़्यादा
कर
लिया
Siddharth Saaz
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किन
नींदों
अब
तू
सोती
है
ऐ
चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ
तो
खोल
शहर
को
सैलाब
ले
गया
Meer Taqi Meer
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पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ
था
हर
नग़्मा-ए-कृष्ण
बाँसुरी
का
Hasrat Mohani
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फिर
वही
रोना
मुहब्बत
में
गिला
शिकवा
जहाँ
से
रस्म
है
बस
इसलिए
भी
तुम
को
साल-ए-नौ
मुबारक
Neeraj Neer
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शोर
की
जब
ये
आदत
हमें
हो
गई
बज़्म
तन्हा
हमें
कर
के
ख़ुद
सो
गई
सब
सेे
मिलता
रहा
नाम
लेकर
तेरा
ये
ख़ता
मुझ
सेे
सौ
मर्तबा
हो
गई
टूटकर
के
मैं
सच
को
दिखाता
रहा
आइनो
सी
मेरी
ज़िन्दगी
हो
गई
उसकी
इक
मुस्कुराहट
को
तड़पे
बहुत
वो
ख़फ़ा
जब
हुई
आप
ही
रो
गई
एक
तितली
जो
थी
फूल
पर
बस
फ़िदा
उड़
गईं
खुशबुएँ
बे-वफ़ा
हो
गई
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anupam shah
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कहाँ
इक
दौर
था
मिलकर
तुम्हें
सब
भूल
जाते
थे
अभी
इक
दौर
है
भूलें
तुम्हें
तो
और
कुछ
देखें
anupam shah
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गुनाहों
का
नहीं
है
इल्म
उसको
क़ैदख़ाने
में
यक़ीनन
छूट
जाएगा
तो
फिर
ये
दिल
लगाएगा
anupam shah
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किसी
पत्थर
की
बस्ती
में
वो
लम्हा
छुप
के
बैठा
है
अभी
तो
कुछ
बरस
लग
जाएँगे
दीवार
ढहने
में
anupam shah
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मैं
अर्से
बाद
इतनी
कश्मकश
में
फिर
से
गुज़रा
हूँ
कि
तेरी
इन्तिज़ारी
है
औ
तन्हा
भी
बहुत
ख़ुश
हूँ
anupam shah
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