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anupam shah
khwaab itnaa bhi haseen mat dekho
khwaab itnaa bhi haseen mat dekho | ख़्वाब इतना भी हसीं मत देखो
- anupam shah
ख़्वाब
इतना
भी
हसीं
मत
देखो
नींद
टूटे
तो
न
ये
शब
गुज़रे
- anupam shah
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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तूने
देखी
है
वो
पेशानी
वो
रुख़्सार
वो
होंठ
ज़िंदगी
जिनके
तसव्वुर
में
लुटा
दी
हमने
तुझपे
उठी
हैं
वो
खोई
हुई
साहिर
आँखें
तुझको
मालूम
है
क्यूँ
उम्र
गंवा
दी
हमने
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Faiz Ahmad Faiz
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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न
जी
भर
के
देखा
न
कुछ
बात
की
बड़ी
आरज़ू
थी
मुलाक़ात
की
Bashir Badr
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बेटियाँ
बाप
की
आँखों
में
छुपे
ख़्वाब
को
पहचानती
हैं
और
कोई
दूसरा
इस
ख़्वाब
को
पढ़
ले
तो
बुरा
मानती
हैं
Iftikhar Arif
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मैंने
मुद्दत
से
कोई
ख़्वाब
नहीं
देखा
है
हाथ
रख
दे
मेरी
आँखों
पे
कि
नींद
आ
जाए
Waseem Barelvi
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मेरे
हाथों
में
कुछ
गुलाब
तो
हैं
जो
न
मुमकिन
रहे
वो
ख़्वाब
तो
हैं
Shaista mufti
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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मुझे
हर
हाथ
ने
कुछ
इस
तरह
से
अब
तराशा
है
न
मुझ
में
रह
गया
हूँ
मैं
कहीं
बाक़ी
मिरे
जैसा
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anupam shah
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मिरी
नज़्मों
में
ख़ुद
को
चाँद
पढ़कर
मत
यूँँ
इतराना
कि
तुम
सेे
इश्क़
करना
और
निभाना
है
हुनर
मेरा
anupam shah
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हज़ारों
बार
मर
मर
कर
यही
इक
फ़लसफ़ा
जाना
कि
जब
तक
ज़िंदगी
है
तब
तलक
जीना
ज़रूरी
है
anupam shah
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मैं
कहाँ
का
था
कहाँ
का
कर
गए
कितना
तुम
मेरा
मुनाफ़ा
कर
गए
ग़म
मिटाने
आए
थे
तुम
तो
मिरे
तुम
मिरे
ग़म
में
इज़ाफ़ा
कर
गए
पूछते
थे
साथ
दोगे
उम्र
भर
जो
मुझे
अब
बेसहारा
कर
गए
जो
दु'आ
थी
बद्दुआ
जैसी
लगी
आप
कैसा
इस्तिख़ारा
कर
गए
सामने
दरिया
था
और
प्यासा
था
मैं
और
वो
मुझ
सेे
किनारा
कर
गए
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anupam shah
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परिंदा
फड़फड़ाना
चाहता
है
क़फ़स
को
तोड़
देना
चाहता
है
हदों
ने
कर
दिया
इसको
अपाहिज
हदों
से
पार
जाना
चाहता
है
मनाने
में
जिसे
सदियाँ
लगी
थी
वो
मुझ
सेे
रूठ
जाना
चाहता
है
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anupam shah
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