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anupam shah
hua ham ko bhala kya gham chalo ham bhi nahin kahte
hua ham ko bhala kya gham chalo ham bhi nahin kahte | हुआ हम को भला क्या ग़म चलो हम भी नहीं कहते
- anupam shah
हुआ
हम
को
भला
क्या
ग़म
चलो
हम
भी
नहीं
कहते
अरे
तुम
भी
तो
कोई
बात
सीधी-सी
नहीं
कहते
निगाहों
को
तिरी
पढ़ना
अजब
सी
कश्मकश
है
ये
न
चुप
रहते
हैं
दोनों
और
ये
कुछ
भी
नहीं
कहते
- anupam shah
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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आज
तो
बे-सबब
उदास
है
जी
इश्क़
होता
तो
कोई
बात
भी
थी
Nasir Kazmi
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तू
भी
कब
मेरे
मुताबिक
मुझे
दुख
दे
पाया
किस
ने
भरना
था
ये
पैमाना
अगर
ख़ाली
था
एक
दुख
ये
कि
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
है
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
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Tehzeeb Hafi
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मैं
ज़िंदगी
के
सभी
ग़म
भुलाए
बैठा
हूँ
तुम्हारे
इश्क़
से
कितनी
मुझे
सहूलत
है
Zeeshan Sahil
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यही
बहुत
है
मिरे
ग़म
में
तुम
शरीक
हुए
मैं
हॅंस
पड़ूँगा
अगर
तुमने
अब
दिलासा
दिया
Imran Aami
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अब
क्या
ही
ग़म
मनाएँ
कि
क्या
क्या
हुआ
मियाँ
बर्बाद
होना
ही
था
सो
बर्बाद
हो
गए
shaan manral
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ग़म
के
पीछे
मारे
मारे
फिरना
क्या
ये
दौलत
तो
घर
बैठे
आ
जाती
है
Shakeel Jamali
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यहाँ
वो
कौन
है
जो
इंतिख़ाब-ए-ग़म
पे
क़ादिर
हो
जो
मिल
जाए
वही
ग़म
दोस्तों
का
मुद्दआ'
होगा
Jaun Elia
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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वक़्त
की
गर्दिशों
का
ग़म
न
करो
हौसले
मुश्किलों
में
पलते
हैं
Mahfuzur Rahman Adil
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अधूरी
बात
का
मतलब
बनाकर
वो
झगड़ा
भी
मुझी
को
सब
बनाकर
उसे
फिर
बारहा
यूँँ
चूमता
था
मैं
काग़ज़
पर
तिरे
दो
लब
बनाकर
ज़माने
भर
से
हम
तो
लड़
गए
थे
तुम्हारी
बात
को
मज़हब
बनाकर
मिरा
क्या
है
मैं
बातों
का
धनी
हूँ
कि
जब
चाहो
कहूंगा
तब
बनाकर
ये
मैने
क्या
किया
है
ज़िन्दगी
का
सबा
को
जी
गया
हूँ
शब
बनाकर
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anupam shah
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तुम्हारी
नज़र
का
सितारा
हुआ
मैं
कुछ
इस
तरह
से
तुम्हारा
हुआ
जो
पकड़ा
था
दामन
तुम्हारा
कभी
ख़ुदा
का
मुझे
कुछ
इशारा
हुआ
मिरे
हाथ
में
तेरा
चेहरा
सनम
वो
क़िस्सा
न
फिर
जो
दुबारा
हुआ
मुझे
इश्क़
का
फ़न
सिखाया
गया
मैं
तड़पा
बहुत
जब
किनारा
हुआ
यूँँ
फिरता
हूँ
अब
बेसबब
गुमशुदा
मुहब्बत
में
लूटा
सा
मारा
हुआ
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anupam shah
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किसी
पत्थर
की
बस्ती
में
वो
लम्हा
छुप
के
बैठा
है
अभी
तो
कुछ
बरस
लग
जाएँगे
दीवार
ढहने
में
anupam shah
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दु'आ
अपनी
भी
ख़ातिर
इस
तरह
कुछ
माँग
ली
मैंने
ये
चाहा
है
कि
तेरे
चाहने
वाले
सभी
ख़ुश
हो
anupam shah
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ज़ख़्मो
पर
यूँँ
लिखना
मरहम
कुछ
तेरा
ग़म
कुछ
मेरा
ग़म
अपनी
कश्ती
अपना
मांझी
दरया
अपना
डूबे
जब
हम
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anupam shah
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